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ग़ज़ल -- चूल्हे वाली गुड़ की चाय लुभाती है ( गिरिराज भंडारी )

चूल्हे वाली गुड़ की चाय लुभाती है

22  22  22  22   22  2

***********************************

याद मुझे वो अक्सर ही आ जाती है

चूल्हे वाली गुड़ की चाय लुभाती है

 

आग चढ़ी वो दूध भरी काली मटकी

वो मिठास अब कहाँ कहीं मिल पाती है 

 

वो कुतिया जो संग आती थी खेतों तक

उसके हिस्से की रोटी बच जाती है

 

छुपा छुपव्वल वाली वो गलियाँ सँकरीं

दिल की धड़कन , यादों से बढ़ जाती है

 

डंडा पचरंगा खेले जिस बरगद में

ख़्वाबों में उसकी डाली आ जाती है 

  

शाला की मेरी कुर्सी वो टूटी सी   

कलम पट्टियाँ ले कर मुझे बुलाती है

 

ज़िन्दा रखना गाँव सदा अपने अन्दर

खुश्बू अमराई की आ समझाती है

 

धुयें धूल से भरी सड़क से पूछूँगा

क्या गाँवों की पगडंडी तक जाती है

***********************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

 

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 6, 2015 at 5:14pm

आदरणीय मिथिलेश भाई , ग़ज़ल की सराहना के लिये आपका आभार !!

एक तरह से आपका कहना उचित है , काफिया के दुहराव से शब्द भंडार की कमी का एहसास होता है । लेकिन जाती को मै इस लिये सीकार कर लिया हूँ क्यों कि , जाती कहीं भी अकेली क्रिया नहीं है , आ जाती , बच जाती , बढ़ जाती आदि है । बस इसी लिये स्वीकार कर लिया हूँ !


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on April 6, 2015 at 4:54pm

साँसों में रची बसी गाँव की खुशबू को..... शब्दों में बहुत खूब ढाला है आ० गिरिराज जी 

बहुत बहुत बधाई 

धुयें धूल से भरी सड़क से पूछूँगा

क्या गाँवों की पगडंडी तक जाती है.............बहुत सुन्दर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 6, 2015 at 4:53pm

आदरणीय शरी सुनील भाई , उत्साहवर्धन के लिये आपका आभारी हूँ ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 6, 2015 at 4:52pm

आदरणीय निर्मल नदीम भाई , हौसला अफज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on April 6, 2015 at 4:27pm

आदरणीय गिरिराज सर बहुत ही बेहतरीन और उम्दा ग़ज़ल हुई है 

पुरानी यादों को अशआर से जीवित कर दिया 

इस सौंधी माटी की खुशबू से भरपूर ग़ज़ल पर हार्दिक बधाई 

बस एक बात समझ नहीं आई, आपने पांच अशआर में जाती काफिया लिया है, एक ही ग़ज़ल में दुहराव से ग़ज़ल में अजीब सी कमी महसूस हो रही है जबकि सहज काफिया उपलब्ध है. कृपया मार्गदर्शन प्रदान करने की कृपा करें.

Comment by shree suneel on April 6, 2015 at 2:09pm
आ0 गिरिराज सर, आपकी इस प्रस्तुति पर मन मुग्ध हो गया. पढ़कर गांव की, सौंधी - सौंधी वो खुश्बू आ जाती है. इस सुन्दर रचना के लिए बधाई.
Comment by Nirmal Nadeem on April 6, 2015 at 1:04pm

क्या कहने आदरणीय बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल हुई है गाँव की मीठी यादों को सजाकर पेश किया आपने।

बहुत मज़ा आय पढ़कर। बहुत सारी दाद हाज़िर करते हुए मुबारकबाद देता हूँ।

कृपया ध्यान दे...

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