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मुझको वो मेरे नाम से पहचान तो गया

मुझको वो मेरे नाम से पहचान तो गया
था रब्त मुझसे भी कभी वो मान तो गया


आवारगी वही रही है आशिकी वही
दीवानेपन की इन्तहा को जान तो गया


दिल थे जिगर भी थे कभी वो और ही थे दिन
अब तो मशीनें रह गई इन्सान तो गया


कट तो रहा है वक्त यूं  तेरे बगैर भी
जीने का जिंदगी से वो सामान तो गया


मज़हब भी चल रहे हं सियासत की राह पर
ईमान से पहले सा वो ईमान तो  गया

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Hari Prakash Dubey on March 30, 2015 at 8:37pm

आदरणीय चन्दन जी ,रचना सुन्दर है , बाकी इसका तकनिकी पक्ष इस विधा के विद्वान् ही बता पायेंगे , बधाई आपको इस सुन्दर प्रयास पर ! सादर 

कृपया ध्यान दे...

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