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गजल ,वो मुझे एकटक देखती रह गई

हाथ पर उसके ठोडी टिकी रह गई
वो मुझे एकटक देखती रह गई

वो हवा हो गई एक पल में कंही
मुस्कुराहट यहाँ गूँजती रह गई

मंजिलों की तरफ दौड़ते -दौड़ते,
जिंदगी कट गई बेबसी रह गई

आपकी याद जिंदा जलाई मगर,
आँधियाँ फिर चलीं,अधजली रह गई

सच का सूरज उजाला बहुत भर गया,
रात आईं मगर रोशनी रह गई

सूबे सिंह सुजान
मौलिक व प्रकाशित

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Comment

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Comment by Shyam Mathpal on March 18, 2015 at 11:05am

आदरणीय सूबेसिंह सूजान जी ,
सुंदर रचना के लिए बधाई .

Comment by Dr. Vijai Shanker on March 18, 2015 at 10:49am
मंजिलों की तरफ दौड़ते -दौड़ते,
जिंदगी कट गई बेबसी रह गई |
आदरणीय सूबे सिंह सुजान जी , इस सुन्दर ग़ज़ल के लिए बहुत बहुत बधाई , सादर।
Comment by Shyam Narain Verma on March 18, 2015 at 10:23am

क्या खूब ग़ज़ल कही है आपने वाह बहुत बहुत बधाई

सादर

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