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कविता :- सच कहना तुम भूली मुझको ?

कविता :- सच कहना तुम भूली मुझको ?

काल चक्र के इस प्रवाह में

सुख दुःख और इस धूप छाँह में

सच कहना तुम भूली मुझको ?

 

कभी तो तुम भी रोती होगी

नियति न्याय को ढोती होगी

हूक सी उठती होगी दिल में

मन ही मन कुछ खोती होगी

सच कहना कैसा लगता है ?

 

समझौतों के साथ में  जीना

जीना पल पल छुप छुप सीना

जीवन की ऐसी ही परिणति

किसने सोचा ऐसा होगा

खामोशी के जैसा होगा

कोई आस जो प्यास अधूरी

जाने कब होगी ये पूरी ?

 

या बन जायेगा अफसाना

जग झूठा झूठा ये बाना

हमें निभाना ! तुम्हे निभाना !!

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Comment

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Comment by Abhinav Arun on March 24, 2011 at 1:58pm
shukriya rajesh jee |
Comment by राजेश शर्मा on March 23, 2011 at 6:49pm
 बहुत सुंदर रचना अभिनव जी बधाई.
Comment by Abhinav Arun on March 23, 2011 at 2:24pm
preetam aur vivek jee kaa bhee shukriya like karne ke liye |
Comment by Abhinav Arun on March 23, 2011 at 2:22pm
shri तपन जी और साहिल जी आभारी हूँ रचना आपने पसंद की |
Comment by Saahil on March 22, 2011 at 3:32am
खूबसूरत रचना !
Comment by Tapan Dubey on March 21, 2011 at 5:17pm
खूबसूरत रचना के लिए बधाई
Comment by Abhinav Arun on March 21, 2011 at 2:41pm
 शुक्रिया विवेक भाई रचना आपके मन भाई |
Comment by विवेक मिश्र on March 21, 2011 at 11:56am
सुन्दर प्रस्तुति के लिए हादिक बधाइयां अरुण जी.

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