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बिस्तर पर सिलवटें

सुबह शाम

दफ्तर काम

ढलता सूरज

उगता चाँद

रात, तुम्हारी याद

आखों से बरसात !!

कभी भूख

कभी प्यास

कभी हर्ष

कभी विषाद

तन्हाई, रात वीरान

सुलगते हुए अरमान !!

तन्हा सफर

स्ट्रीट लाईट

पाखी जलता

मन मचलता

प्यास, बैचैन करवटें

बिस्तर पर सिलवटें !!

उगता सूरज

आँखें लाल

वही सवाल

वही मदहोशी

गुम, खुद में कहीं

नहीं सुध किसी चीज़ की !!

फिर वही

सिलसिला

सुबह शाम

दफ्तर काम

ढलता सूरज

उगता चाँद

रात, तुम्हारी याद

आखों से बरसात !!

 

© हरि प्रकाश दुबे

"मौलिक व अप्रकाशित"

 

 

 

 

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Comment

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Comment by Hari Prakash Dubey on February 17, 2015 at 6:53pm

आदरणीया परी जी, रचना पर आपकी उपस्थिति  और आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार ! सादर

Comment by Pari M Shlok on February 17, 2015 at 12:22pm
बहुत सुन्दर लिखा है आपने
Comment by Hari Prakash Dubey on February 17, 2015 at 11:51am

आदरणीय डॉ आशुतोष जी,रचना पर आपकी उपस्थिति  और प्रोत्साहन के लिए हार्दिक आभार ! सादर !

Comment by Hari Prakash Dubey on February 17, 2015 at 11:50am

आदरणीय मुकेश जी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत - बहुत धन्यवाद ! सादर

Comment by Hari Prakash Dubey on February 16, 2015 at 10:12pm

आदरणीय डॉ गोपाल नारायण श्रीवास्तव सर ,रचना पर आपकी उपस्थिति  और प्रोत्साहन के लिए हार्दिक आभार ! सादर !

Comment by Hari Prakash Dubey on February 16, 2015 at 9:07pm

आदरणीया राजेश कुमारी जी ,आपकी बधाई सहर्ष शिरोधार्य है. आपका ह्रदय से आभार,अपना  स्नेह व् आशीर्वाद बनाये रखियेगा ,सादर!

Comment by Hari Prakash Dubey on February 16, 2015 at 9:05pm

आदरणीय खुर्शीद खैरादी साहब आपकी सुन्दर विस्तृत प्रतिक्रिया से उत्साह मिला आपका बहुत - बहुत धन्यवाद ! सादर

Comment by Hari Prakash Dubey on February 16, 2015 at 7:43pm

आदरणीय सुशील सरना सर आपकी अत्यंत उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया पाकर बहुत मनोबल मिला, आपका आभारी हूँ सादर! "

Comment by Hari Prakash Dubey on February 16, 2015 at 7:38pm

आदरणीय गिरिराज भंडारी सर, हृदय से धन्यवाद , सादर 

Comment by Hari Prakash Dubey on February 16, 2015 at 7:33pm

आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी, आपकी प्रतिक्रिया से हमेशा उत्साह मिलता है  आपका बहुत - बहुत धन्यवाद ! सादर

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