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"अरे!!  तुम्हारे जैसे गरीब अनाथ के झोपड़े में महात्मा गाँधी की तस्वीर...”

 

“हाँ! साहब,  अभी कुछ दिन पहले ही लोगों ने चौराहे पर इस तस्वीर को लगाकर.. मालायें पहनाई, खूब  जोर-शोर से भाषण-बाजी की. फिर इसे सब,  वहीं छोड़कर चले गये.. ये वहां बे-सहारा थे,  तो इन्हें अपने घर ले आया...”

 

 

     जितेन्द्र पस्टारिया

 

 (मौलिक व् अप्रकाशित)   

 

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Comment by somesh kumar on January 25, 2015 at 5:05pm

तस्वीर की राजनीति और असल तस्वीर में परिवर्तन ना होना |बहुत सुंदर और सफल लघुकथा |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 25, 2015 at 3:57pm

आदरणीय  जितेन्द्र पस्टारिया जी सफल लघुकथा के लिए हार्दिक बधाई. कथ्य के मर्म को जोरदार तरीके से व्यक्त करती लघुकथा.

कृपया ध्यान दे...

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