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हवा मिस- झुक -लुक -लुक -छुप

हवा मिस- झुक -लुक -लुक -छुप


डार-डार से करे अंखियां चार


कस्तूरी हुई गुलाब की साँसें


केवड़ा,पलाश करे श्रृंगार


छूते ही गिर जाये पात लजीले


इठलाती-मदमाती सी बयार


सुन केकि-पिक की कुहूक-हूक


बौरे रसाल घिर आये कचनार


अम्बर पट से छाये पयोधर


सुमनों पर मधुकर गुंजार


कुंजर,कुरंग,मराल मस्ती में


मनोहर,मनभावन संसार


यमुना- तीरे माधव बंशी


फिर राधे-राधे करे पुकार


नख-शिख सज चली राधे-रमणी


भर मन-अनुराग अपरम्पार




मेरी पुस्तक "एक कोशिश रोशनी की ओर "से

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Comment by Rash Bihari Ravi on December 10, 2010 at 3:45pm

vah khubsurat manmohak

Comment by Abhinav Arun on December 10, 2010 at 2:51pm

अहा !वाह वाह ! क्या रवानगी है |शब्द जैसे झरने से झर रहे हों |

Comment by Chhavi Chaurasia on June 12, 2010 at 3:29pm
हवा मिस- झुक -लुक -लुक -छुप डार-डार से करे अंखियां चार
कस्तूरी हुई गुलाब की साँसें केवड़ा,पलाश करे श्रृंगार..... बहुत ही खूबसूरत और मनभावन कविता है. ख़ासकर पहली लाइन ...हवा मिस- झुक -लुक -लुक -छुप ...पढ़ने मे एक अलंकार की अनुभूति होती है.
Comment by aleem azmi on June 9, 2010 at 1:01pm
mam bahut umda ...ati sunder

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on June 9, 2010 at 9:36am
छूते ही गिर जाये पात लजीले
इठलाती-मदमाती सी बयार
सुन केकि-पिक की कुहूक-हूक
बौरे रसाल घिर आये कचनार

बहुत बढ़िया लिखी है आशा दीदी, काफ़ी सुंदर रचना बन पड़ी है,
Comment by asha pandey ojha on June 8, 2010 at 11:45am
admin ji ,satish ji ,Sanjiv ji Preetam ji & yograj ji sir ...aap sabhee ka bahut bahut aabhar ..ye rachna padh kar housla afzai karne ka ....dil se shukriya ..

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on June 7, 2010 at 7:59pm
कमाल की कविता कही है आशा जी, एक एक पंक्ति में संगीत है! //कस्तूरी हुई गुलाब की साँसें //
गुलाब की सांसें ??? वाह वाह वाह इतने कोमल भाव और सोच की इतनी ऊंची उड़ान? हद है हद ! इसके आगे नि:शब्द हूँ , जय हो !
Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on June 7, 2010 at 6:56pm
bahut hi badhiya rachna hai asha didi......aisehi likhte rahe...
Comment by sanjiv verma 'salil' on June 7, 2010 at 6:43pm
मुझको यह रचना रुची
Comment by satish mapatpuri on June 7, 2010 at 5:01pm
अम्बर पट से छाये पयोधर


सुमनों पर मधुकर गुंजार


कुंजर,कुरंग,मराल मस्ती में


मनोहर,मनभावन संसार
आशा जी, हर कवि को कुदरत की शै लुभाती है, पर आपका यह चित्रण वाकई काबिले तारीफ़ है, धन्यवाद.

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