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देखा   असूल    मैंने    अजब   सर जमीन पर

जो    ठोकरें     लगाते   रहे    उम्र    भर    मुझे

शैतानियत ने किस कदर चोला बदल लिया

वे   ही   जनाजे    में    मेरी    कन्धा   लगा  रहे  I

 

चप्पल न  थी   नसीब   छाले   पाँव   में पड़े

मै   जिन्दगी  में   यूँ   ही   दर्दमंद  हो चला

अल्लाह   तूने   मौत   दी   तेरे   बड़े  करम

इक बार  आठ  पाँव   की सवारी तो मिली  I

 

मैंने    हयात   में    न    कभी    हार   थी  मानी

हर  वक्त    रहे    चार    छह    मेरे    दबाव  में

यह  सिलसिला जारी रहा मरने का बाद भी

आराम से  दो-चार   पर  तब    भी    सवार था I

 

मै पांच   फिट  जमीन    से    ऊंचा    उठा    रहा

कुछ दूर  चला   इस   तरह मरने   के बाद भी

इत  राना  जिन्दगी का  काम प   र नहीं आया

आखिर में वही पांच फिट नीचे जगह मिली I

(मौलिक व् अप्रकाशित )

 

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Comment by vijay nikore on October 12, 2014 at 12:58pm

जीवन की सच्चाई का बहुत ही सुन्दर चित्रण किया है आपने। हार्दिक बधाई, आदरणीय गोपाल नारायन जी।

Comment by Meena Pathak on October 12, 2014 at 11:53am

बहुत सुन्दर ...यही सच है जीवन का ..अंत में पाँच फीट जमीन ही मिलती है पर काश कि ये सच हमें याद रहे ...

Comment by somesh kumar on October 11, 2014 at 7:40pm

अपनी मंजिल पे आई -ज़िन्दगी 

मौत की बाहों में बड़े इत्मीनान से 

जिन्होंने जीते जी ना दिए एक लत्ता कभी 

वो कफ़न पे कफ़न लाने दुकान से 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 11, 2014 at 7:09pm

जिंदगी की एक बड़ी हक़ीकत को शब्द बध्ध किया है आपने जो पांच फीट ऊपर चलते हैं वो एक दिन पांच फीट नीचे जाते हैं यही तो अंतिम सच है ...बहुत खूब आ० डॉ. गोपाल नारायण जी, बधाई आपको.  

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