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"खुद से खुद की दूरी क्यों"

खुद से खुद की दूरी क्यों।
ऐसी भी मजबूरी क्यों।।

गर वो सबकुछ जानता है।
उससे बात ज़रूरी क्यों।।

तेरी मेरी इक ज़ुबान।
पूरी बात अधूरी क्यों।।

रात रातभर बातें की।
होती बात न पूरी क्यों।।

गर वो सच में बेगुनाह।
फाँसी की मंज़ूरी क्यों।।

पता नहीं उसमें क्या है।
ऐसे को कस्तूरी क्यों।।
*******************
राम शिरोमणि पाठक"दीपक"
मौलिक/अप्रकाशित

Views: 637

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Comment by ram shiromani pathak on September 28, 2014 at 11:15pm
जीतेन्द्र भाई बहुत आभार आपका
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on September 15, 2014 at 8:39pm

बहुत सुंदर गजल कही आपने आदरणीय राम भाई, हार्दिक बधाई 

Comment by ram shiromani pathak on September 14, 2014 at 3:18pm

प्रिय पवन भाई बहुत बहुत आभार आपका

Comment by Pawan Kumar on September 14, 2014 at 3:14pm

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति भईया ... सादर बधाई !

Comment by ram shiromani pathak on September 11, 2014 at 11:06pm
हार्दिक आभार आदरणीय नरेन्द्र जी।। सादर
Comment by ram shiromani pathak on September 11, 2014 at 11:05pm
हार्दिक आभार आदरणीय गोपाल नारायण जी।।। सदर
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 11, 2014 at 5:52pm

बहुत सुन्दर i  भाव पूर्ण i  बधाई हो i  

Comment by ram shiromani pathak on September 11, 2014 at 12:16am
हार्दिक आभार महिमा जी।। सादर
Comment by MAHIMA SHREE on September 10, 2014 at 10:39pm

वाह वाह ..आप तो छा गए सभी अशआर.. शानदार ..हार्दिक बधाई 

Comment by ram shiromani pathak on September 10, 2014 at 8:23pm
बहुत बहुत आभार भाई अखंड जी।।। सादर

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