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" बेटा , अब दूसरे विवाह की तैयारी करो , इससे तो कुछ होना नहीं है " |
" लेकिन माँ , दूसरे में भी क्या भरोसा , थोड़ा और सबर करो " , और बात आई गयी हो गयी |
कुछ महीनों बाद खुश खबरी थी , माँ बहुत प्रसन्न हुई |
और बेटे का दोस्त जो कुछ दिनों पहले आया था , अचानक वापस चला गया |

मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on September 5, 2014 at 8:46pm

आभार सौरभजी..

Comment by Shubhranshu Pandey on September 3, 2014 at 8:59pm

आदरणीय विनय जी,

पौराणिक कथाओं के कई संदर्भ याद आ गये. अब तो टेस्ट ट्युब ने कई समस्याओं का समाधान कर दिया..

सादर.

Comment by विनय कुमार on September 1, 2014 at 11:44pm

आभार जीतेन्द्र गीतजी..

Comment by विनय कुमार on September 1, 2014 at 11:43pm

आभार डॉ गोपाल नारायण जी ..

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on September 1, 2014 at 9:13pm

बढ़िया लघुकथा. बधाई आदरणीय विनय जी

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 1, 2014 at 6:30pm

वल्लाह ----

क्या चुभती  हुयी कथा है ?

बहुत सुन्दर i आदरणीय i

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