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दोहे - मीना पाठक

होते जो बहुरूपिया, मिले न उनकी थाह |
मन में अंतरघात  है, सुर है मधुर अथाह ||

गीली लकड़ी की तरह, सुलगी वो दिन रात |
सिसक-सिसक कर जल मुई,हृदय वेदना घात ||

.

जीवन के दिन चार हैं, नेक करें कुछ काज 
अंत समय कब हो निकट,नहीं पता कल आज ||

किस्मत में जो था मिला, सर फोड़े क्यों रोय |
पूर्व जन्म का कर्म है, अब रोये क्या होय ||

मीना पाठक 
मौलिक अप्रकाशित

Views: 822

Comment

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Comment by Meena Pathak on August 5, 2014 at 5:28pm

आदरणीय विजय जी, आ० अजय जी, आ० लक्ष्मण भाई आप सभी का बहुत बहुत आभार | सादर 

Comment by Meena Pathak on August 5, 2014 at 5:26pm

आदरणीय सौरभ सर प्रयासरत हूँ और रहूँगी पर सफलता कितनी मिलेगी ये नही जानती ......आप सभी का स्नेहाशीष मिलता रहे यूँ ही इसी आशा के साथ बहुत बहुत आभार आप का | सादर 

Comment by Meena Pathak on August 5, 2014 at 5:24pm

बहुत बहुत आभार आ० नरेंद्र सिंह जी | सादर 

Comment by Meena Pathak on August 5, 2014 at 5:23pm

दोहे सराहने हेतु सादर आभार आ० प्रदीप सर 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 5, 2014 at 10:44am

आदरणीय मीना बहन इन मनमोहक दोहों के लिए बहुत बहुत बधाई ।

Comment by Ajay Agyat on August 5, 2014 at 7:12am

अति उत्तम

Comment by विजय मिश्र on August 4, 2014 at 6:29pm
"जीवन के दिन चार हैं, नेक करें कुछ काज
अंत समय कब हो निकट,नहीं पता कल आज ||"

भाव उत्तम , साधुवाद मीनाजी

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 4, 2014 at 6:15pm

आपके इस गंभीर प्रयास पर मन बहुत प्रसन्न है आदरणीया. इस प्रयास को सतत और दीर्घकालिक बनायें. 

सादर

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on August 4, 2014 at 1:59pm

सादर बधाई, सार्थक सन्देश, वस्तु स्थिति को दर्शात हुआ . 

Comment by Meena Pathak on August 4, 2014 at 11:33am

आदरनीय राजेश कुमारी जी दोहे सराहने हेतु बहुत बहुत आभार 

सही कहा आपने ..सहमत हूँ ..मार्गदर्शन हेतु पुन: आभार 

कृपया ध्यान दे...

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