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दृष्टि   मिलन  के  प्रथम पर्व में

दृप्त    वासना   नभ   छू   लेती

पागलमन   को   बहलाता   सा

जग  कहता   नैसर्गिक   सुख है I

 

क्या  निसर्ग  सम्भूत  विश्व  में

क्या स्वाभाविक और सरल क्या

वाग्जाल   के    छिन्न   आवरण

में     मनुष्य   की   दुर्बलता    है I

 

बुद्धि   दया   की   भीख मांगती

ह्रदय    उपेक्षा    से    हंस    देता

मानव !    तेरी      दुर्बलता    का

इस    जग   में   उपचार   नहीं  है I

 

संस्कार    है    गत    जन्मो   का

या   फिर     है   अँधा    आकर्षण

छल   भी   नहीं   न   है  सम्मोहन

मनुज    हृदय   का    पाप  प्रेम   है I

 

 

[मौलिक व् अप्रकाशित ]

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Comment by Santlal Karun on August 1, 2014 at 9:50pm

आदरणीय डॉ. गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी,

आप ने 'प्रेम' को 'दृष्टि मिलन', 'दृप्त' वासना', 'नैसर्गिक सुख', 'वाग्जाल का छिन्न आवरण', 'गत  जन्मो का मनुष्य की दुर्बलता का संस्कार',  'अँधा आकर्षण', 'छल', 'सम्मोहन', तथा  'मनुज हृदय का पाप' के परिवृत्त में अत्यंत मौलिक ढंग से परिभाषित किया है | चार बंधों का यह छंदबद्ध गीत प्रेम की अपनी मौलिक परिभाषा के लिए विशेष रूप से जाना जाएगा --

"संस्कार    है    गत    जन्मो   का

या   फिर     है   अँधा    आकर्षण

छल   भी   नहीं   न   है  सम्मोहन

मनुज    हृदय   का    पाप  प्रेम   है I"

...इस अनुपम रचना के लिए सहृदय साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

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