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इस पार आ रहे हैं कुछ जाने माने लोग
उस पार जा रहे हैं कुछ जाने माने लोग
कैसी है राम राम ये कैसी सलाम है
पहचान नहीं पा रहे कुछ जाने माने लोग

फिर कई सूत्र नयी धुन के रुई निकले हैं
तंग कुर्ते पतंग लहँगे हैं
गली आवाज़ एक नंगी गली से आयी
देह सस्ती है वस्त्र महँगे हैं

कीमती वक्त खोते जा रहे हो
बिना मौसम के होते जा रहे हो
कोई जलधार थमे पानी से कह आयेगी
क्यों किनारे पै गोते खा रहे हो

इन अकउवोँ की कली में बैठ कर
राज मधुवन की कली के खोलना मत
ढोल हैं ये भांगड़ा के नृत्य हैं
शास्त्र के संगीत के स्वर छेड़ना मत

(मौलिक व अप्रकाशित)

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 4, 2014 at 12:26pm

वैचारिकता को सुन्दर शब्द देने का प्रयास हुआ है.  बधाई !

किन्तु, शाब्दिक होने में तनिक और गहनता की अपेक्षा थी. जैसे विचार, वैसे शब्द ! तो फिर वैसा ही संयोजन भी होना चाहिये.
मुक्तकों का अपना विन्यास होता है, यह हमसभी जानते हैं, आदरणीय. आपके पिछले मुक्तक देख चुका हूँ, आदरणीय. अतः समवेत में कह पा रहा हूँ. इस बार के मुक्तक आज़ाद हैं.

फिर कई सूत्र नयी धुन के रुई निकले हैं .. रुई पुल्लिंग बहुवचन का ब्यौरा समझ में नहीं आया, आदरणीय. महती कृपा होगी यदि स्पष्ट हो पाया.
सादर
 

Comment by Alka Gupta on August 2, 2014 at 5:31pm

वाह्ह्ह्हह्ह्ह्ह अति सुन्दर सभी मुक्तक ..सादर वन्दे 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 2, 2014 at 10:12am

आदरणीय प्रेम नारायण भाई , लाजवाब मुक्तक के लिए बधाइयाँ |

फिर कई सूत्र नयी धुन के रुई निकले हैं
तंग कुर्ते पतंग लहँगे हैं
गली आवाज़ एक नंगी गली से आयी
देह सस्ती है वस्त्र महँगे हैं   ------------ अति सुन्दर !

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on August 1, 2014 at 6:31pm

गहरी सोच उभर कर आई है आपके मुक्तक में रचित भाव से -

जाने माने लोग भी एक दुसरे के समुख से गुर्जर रहे है पर पहचान नहीं रहे है - वाह ! 

देह सस्ती है वस्त्र महंगे है - अब तो कास्ट्यूम भी खूब महंगे हो गए, - बहुत खूब लाजवाब तंज कसा है

 

चरों मुक्तक सुंदर लगे | बहुत बहुत बधाई पं प्रेम नारायण दीक्षित जी 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 1, 2014 at 11:22am

प्रेमजी

आपके मुक्तक  सुंदर है और उत्कृष्ट भी  पर निगूढ़  है  i सामान्य पाठक केलिए तो बाउंसर  हैं  i मै तो आपकी लेखनी को प्रणाम करूंगा i

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