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प्रतीक्षा // प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा//

प्रतीक्षा

-------

प्रतीक्षा है

किसकी?

किसे है प्रतीक्षा

मन, मस्तिष्क

या आँखें

विभेद कठिन

आज तक स्मृति में है

वह सब कुछ

विस्मृत हो तो कैसे

क्या उसने भुला दिया होगा

शायद भुला सके

पर मैं नहीं भूल पाया

गुजरा कल

वे यादें

स्मृति पटल पर

आज भी कौंध जाती हैं

पुरवाई बयार से उभरी

पुरानी चोट की तरह

सुबह-शाम

सड़क से गुजरती बस से

झाँकती बाला

अद्वितीय मुस्कान

लहराते केश

एक मौन आमन्त्रण

शायद प्रतीक्षा ही जिंदगी है

थमा नहीं है

बस का आना-जाना

जर्जर हो चुकी है

खड़खड़ाती

भंग करती मेरी तन्द्रा

आज भी वह नहीं

आई शायद कभी....

प्रतीक्षा है

एक अंतहीन प्रतीक्षा

मौलिक /अप्रकाशित 

प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा

२७-७-२०१४ 

Views: 828

Comment

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Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on August 2, 2014 at 1:37pm

परम सनेही श्री सौरभ पांडे /अनुज श्री जी 

कंधे पर कई लाशों का बोझ है . शमशान तक पहुंचाता  नही 

शेर अकेला हो जंगल में सुनामी से घबराता नही 

सत्य वचन है आपका आज्ञा   शिरोधार्य 

प्रेम निरंतर रहे बना करता रहूँ सत्कार्य 

था  अकेला मैं चला अकेला ही जाऊंगा 

रोके टोके लाख कोई 

गीत मिलन के ही गाऊंगा 

जय हो मंगल मय हो 

सादर / सस्नेह 

मेरे को हमेशा कि तरह रास्ता दिखाते रहिये 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 2, 2014 at 2:09am

आदरणीय प्रदीपभाईजी, स्वस्थ हो रहे हैं, सुन कर असीम आनन्द महसूस कर रहा हूँ.  ..

आदरणीय, यदि मेरा वाकई भला चाहते हैं. आपको मेरे प्रति तनिक ’भाव’ हैं, तो ऐसे किसी सम्बोधन से बचें.

पहले दुखता था. अब तो ये गाली लगता है, वो भी खिजलाता हुआ.
(आपके माध्यम से स्पष्ट कह दिया, ताकि अनन्यों को ’क्लू’ मिल जाये..)
सादर

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on August 1, 2014 at 6:55pm

आदरणीय गुरुदेव  जी/ आप जो भी कहें अपने संबोधन में. गुरु बना चुका हूँ तों वापस कैसे लौटूं.  

सादर 

बीमारी    कुछ इस कदर  बढ़ी कि चलने पर लगता है जैसे चांद पर चल रहा हूँ. दृष्टि  बहुतकम हो गयी. अब कुछ सुधार है. लिखता कुछ हूँ लिखा कुछ और जाता है. ख़ैर आपका स्नेह प्राप्त हुआ .

स्नेह हेतु आभार 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on August 1, 2014 at 6:51pm

आदरणीय अमोद कुमार श्रीवास्तव जी 

सादर 

सच ही है 

स्नेह हेतु आभार 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on August 1, 2014 at 6:49pm

आदरणीय डा. आशुतोष मिश्र जी 

सादर 

सच ही है 

स्नेह हेतु आभार 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on August 1, 2014 at 6:48pm

आदरणीय लड़ीवाला जी 

सादर 

चलते -चलते ?

स्नेह हेतु आभार 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on August 1, 2014 at 6:47pm

आदरणीय डा . साहब श्रीवास्तव जी 

सादर 

शायद ?

स्नेह हेतु आभार                                          


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 1, 2014 at 5:17pm

बाला के बिम्ब पर आपने बहुत कुछ कहने की कोशिश की है,  भाईसाहब. दिली बधाई ही दूँगा.

वैसे आपको पुनः क्रियाशील होते देखना हृदय को भला लग रहा है.  ऐसे ही प्रयत्नशील रहें.

सादर

Comment by Amod Kumar Srivastava on July 29, 2014 at 8:32am

अतीत हमेशा वर्तमान पे भारी रहा है .... भावों को उकेरने के लिए ... बधाई ... सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on July 28, 2014 at 4:38pm

आदरणीय कुशवाहा जी ..स्मृति पटल से यादों को हटा पाना वाकई इतना आसान नहीं है ,बेहतरीन रचना के लिए तहे दिल बधाई सादर 

कृपया ध्यान दे...

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