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“बेटा..! ऐसा मत कर, फेंक दे ये ज़हर की बोतल I ले हमने जमीन के कागज़ पर दस्तख़त कर दिए हैं. जा, अब मर्ज़ी इसे बेच या रख। बस अपनी पत्नी और बच्चों के साथ ख़ुशी से रह । हमारा क्या है बेटा, हम कुछ दिन के मेहमान हैं,जी लेंगे जैसे-तैसे...” माँ रुंधे हुए गले से कहा.

सभी निगाहें बेटे पर केंद्रित थीं जो जहर की बोतल को आँगन में ही फेंक दस्तखत किये हुए कागजों को  समेटने में व्यस्त था. लेकिन उसी बोतल को उठाकर अपनी कोठरी में ले जाते बापू पर किसी की भी नज़र नही पडी थी.

    जितेन्द्र 'गीत

(मौलिक व् अप्रकाशित)'

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Comment by gumnaam pithoragarhi on July 13, 2014 at 1:20pm

khooob sirji ,,,,,,,,,,,,,,,, waah .........

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 13, 2014 at 10:32am

आदरणीय योगराज जी. 

आप जैसे श्रेष्ठ लघुकथा कार की पारखी नजर को नमन. आपकी उपस्थिति से मन को बहुत संतोष मिला, अपना स्नेह व् मार्गदर्शन हमेशा बनाये रखियेगा.

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 13, 2014 at 10:25am

आपकी उत्साह वर्धक प्रतिक्रिया हेतु आपका ह्रदय से आभारी हूँ आदरणीय अखिलेश जी. स्नेह बनाये रखियेगा

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 12, 2014 at 9:14pm

रचना के मर्म को आपने छुआ, आपका हार्दिक आभार आदरणीया प्रज्ञा जी

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 12, 2014 at 9:12pm

लघुकथा पर आपकी सराहना हेतु आपका ह्रदय से आभारी हूँ आदरणीय विनय जी

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 12, 2014 at 9:10pm

आदरणीय शुभ्रांशु जी,

लघुकथाओं पर आपकी प्रतिक्रिया का बड़ी बेसब्री से इन्तजार रहता है. यहाँ लेखक ने  अंत में कागज और जहर की बोतल में से, पुत्र द्वारा कीमती कागज़ और पिता द्वारा जहर उठाने का अभिप्राय यह रखा है कि माता-पिता हमेशा अपने बच्चों को अमृत(खुशियाँ) देकर स्वयं जहर(दुःख ) ले लेते है. शायद ऐसा कोई किसी के लिए नहीं कर पाता है. 

आपकी उत्साह वर्धक प्रतिक्रिया हेतु आपका ह्रदय से आभारी हूँ, अपना स्नेह यूहीं बनाये रखियेगा

..सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 12, 2014 at 9:00pm

आपकी सराहना हेतु आपका ह्रदय से आभारी हूँ आदरणीया राजेश दीदी. अपना स्नेह व् आशीर्वाद बनाये रखियेगा

सादर!

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on July 12, 2014 at 7:56pm

अनूठी लघुकथा ....बाप ऐसे ही होते है और बेटे तो....अजीब दृश्य प्रस्तुत किया है आपने....


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 12, 2014 at 4:31pm

आदरणीय जितेन्द्र भाई , आज घर की मे स्थितियाँ पैदा हो चुकी है , उन को आपने बहुत खूब सूरती से लघु कथा मे बताया है , और अंत मे एक प्रश्न भी पाठक के दिमाग मे उठा दिया है , शीशी क्यों उठाई गई ? बहुत सुन्दर ! रचना के लिये आपको दिली बधाइयाँ ॥

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 12, 2014 at 10:57am

वाह जीतू i

दिल जीत लिया i बहुत सुन्दर i

कृपया ध्यान दे...

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