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"तड़ाक !"

थप्पड़ बड़े जोर का था और साहब की उतनी ही तीखी आवाज़

"खाने में फिर बाल , दिखाई नहीं देता तुमको "|

बाई भी सहम गयी और सोचने लगी कि कल तो मेमसाब कह रहीं थीं कि कैसा मर्द है तुम्हारा, तुमको पी कर पीटता है , और साहब ने तो आज पी भी नहीं है | 

 ( मौलिक और अप्रकाशित )

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Comment by विनय कुमार on July 16, 2014 at 1:06am

आभार सौरभ पाण्डेयजी..


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 15, 2014 at 2:40am

अभी-अभी आपकी उस लघुकथा से गुजर रहा था जहाँ स्वतंत्रता दिवस के माहौल पर हम अटपटे हुए जारहे थे. कि, सामने यह लघुकथा आ गयी.  और सच कहूँ तो यह कथा अपने माहौलके कारण ही विश्वसनीय तथा मुखर बन गयी है.
एक अत्यंत सार्थक, सोद्येश्य तथा सटीक लघुकथा के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें, आदरणीय विनय जी.
शुभ-शुभ

 

Comment by विनय कुमार on July 9, 2014 at 9:08pm

आभार सुभ्रांशुजी एवम जवाहरलाल जी..

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on July 9, 2014 at 8:58pm

आखिर मर्द की मर्दानगी तो पत्नी पर ही दिखलाई पड़ती है… अत्यंत छोटी लघु कथा पर सन्देश बड़ा 

Comment by Shubhranshu Pandey on July 9, 2014 at 8:24pm

आदरणीय विनय जी,

सुन्दर कथा. बाई की सोच ने कथा को और भी विस्तार दिया है...बधाई.

सादर.

Comment by विनय कुमार on July 9, 2014 at 7:51pm

आभार विजय निकोरेजी |     

Comment by vijay nikore on July 9, 2014 at 3:29pm

लघु कथा अच्छी लगी। बधाई।

Comment by विनय कुमार on July 7, 2014 at 6:41pm

शुक्रिया अरुणजी..

Comment by अरुन 'अनन्त' on July 7, 2014 at 3:22pm

वाह आदरणीय विनय भाई जी थप्पड़ वाकई जोरदार और असरदार है मजा आ गया दिल से बधाई स्वीकारें.

Comment by विनय कुमार on July 7, 2014 at 12:31pm

आभार रवि प्रभाकरजी..

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