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२ २ १ १ / २ २ १ १ / २ २ १ २ / १ २  
भावों से पले शब्द तो वो छंद हो गए 
कान्हा जो रहे पाल बाबा नंद हो गए 
.
छूकर के गया कृष्ण तो ये मन भी कह उठा 
फूलों से मिले शूल तो मकरंद हो गए
.
आखों को लगे छू रहा है आज तन बदन  
दर्द ऐ दिल की आज तो वो रंद हो गए 
.
नफरत से भरे ज्ञान की दीवार को गिरा  
हर भोर ख़ुशी गा रही आनंद हो गए 
.
राधा से मिले कृष्ण अधर पे है बांसुरी 
फिर रास रचाने को रजामंद हो गए  
.
जख्मों पे दिए जख्म उन्हें पीर ना हुई   
जाने जो लगे हम तो फिकरमंद हो गए 
.
आशीष ( सागर सुमन ) 
मौलिक एवं अप्रकाशित

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on June 29, 2014 at 8:00pm

कठिन काफ़िया को सफलता पूर्वक निभा जाना ही इस ग़ज़ल की खूबसूरती है, ग़ज़ल अच्छी लगी, बधाई स्वीकार करें आदरणीय आशीष जी।

Comment by Pradeep Rai on June 25, 2014 at 11:21am
जख्मों पे दिए जख्म उन्हें पीर ना हुई   
जाने जो लगे हम तो फिकरमंद हो गए
Wah kya bat hai Ashis ji Dil bag bag ho gaya.
Comment by MAHIMA SHREE on June 14, 2014 at 9:51am

बहुत खूब .. हार्दिक बधाई

Comment by Maheshwari Kaneri on June 1, 2014 at 7:57pm

  खूबसूरत गज़ल के लिये आपको हार्दिक बधाइयाँ 

Comment by Vindu Babu on May 27, 2014 at 11:12pm

अच्छी गज़ल कही है आपने। आपको हार्दिक बधाई।

सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 17, 2014 at 5:07pm

आदरणीय आशीष भाई , खूबसूरत गज़ल के लिये आपको हार्दिक बधाइयाँ ॥

Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 17, 2014 at 2:05pm

आशीष जी इस बेहतरीन रचना के लिए तहे दिल बधाई सादर 

Comment by अरुन 'अनन्त' on May 16, 2014 at 12:25pm

आशीष भाई बहुत उम्दा पेशकश यह अंदाज बहुत ही पसंद आया काफिया चुनाव बहुत ही शानदार मेरी ओर से बधाई प्रेषित है स्वीकार कीजिये.

दर्द ऐ दिल की आज तो वो रंद हो गए... इसकी तक्तीअ पुनः कर लीजिये.

Comment by Ashish Srivastava on May 15, 2014 at 2:17pm
Comment by Ashish Srivastava on May 15, 2014 at 2:17pm

Meena Pathak: Utsaah vardhan ke lilye shukria 

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