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ग़ज़ल: "क्यूँ लगता है"

बह्र = 121 2122 2122 222

हर एक आदमी इंसान सा क्यूँ लगता है
खुदा तेरा मुझे भगवान् सा क्यूँ लगता है

हज़ारो लोग दौड़े आते हैं मंदिर मस्जिद
मुझे खुदा ही परेशान सा क्यूँ लगता है

 कि सारी जिंदगी नाजों से था पाला जिसने
वो बूढ़ा बाप भी सामान सा क्यूँ लगता है 

सियासी कूचों से होकर के गुजरने वाला 
हर एक शख्स बे ईमान सा क्यूँ लगता है

इबादतों का कोई वक्त जो बांटूं भी तो
हर एक माह ही रमजान सा क्यूँ लगता है

अनुराग सिंह "ऋषी"

मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 961

Comment

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Comment by Anurag Singh "rishi" on April 26, 2014 at 12:45am

आदरणीय प्रज्ञा मैम आपके बहुमूल्य टिप्पड़ी हेतु बहुत बहुत आभार आपका
सादर

Comment by Anurag Singh "rishi" on April 26, 2014 at 12:45am

आदरणीया महिमा मैम ह्रदय से आभार आपका
सादर

Comment by Anurag Singh "rishi" on April 26, 2014 at 12:44am

आद्नीय विजय सर आपको कोटिशः धन्यवाद
सादर

Comment by Anurag Singh "rishi" on April 26, 2014 at 12:43am

आदरणीय उमेश सर हौसला अफजाई हेतु बहुत बहुत धन्यवाद

सादर

Comment by Anurag Singh "rishi" on April 26, 2014 at 12:43am

आदरणीय गिरिराज सर आपके कीमती एवं प्रेरणादायक टिप्पड़ी हेतु दिल से शुक्रिया आपका
सादर

Comment by Anurag Singh "rishi" on April 26, 2014 at 12:41am

आदरणीय गुमनाम सर बहुत बहुत आभार आपका सर
सादर

Comment by Pragya Srivastava on April 25, 2014 at 12:12am
आदरणीय, अनुराग जी
सुंदर गजल,बधाईआपको
Comment by MAHIMA SHREE on April 24, 2014 at 9:24pm

वाह बहुत ही बढ़िया .. बधाई आपको

Comment by विजय मिश्र on April 24, 2014 at 3:42pm
भई वाह ,बहुत सुंदर |बधाई |
Comment by umesh katara on April 23, 2014 at 8:01pm

सुन्दर गजल वाह

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