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ग़ज़ल - ' कहीं है आग जलती सी ' ( गिरिराज भंडारी )

1222     1222     1222      1222   

 

कहीं कुछ दर्द ठहरा सा , कहीं है आग जलती सी

कभी सांसे हुई भारी , कभी हसरत मचलती सी

कभी टूटे हुये ख़्वाबों को फिर से जोड़ता सा मै

कभी भूली हुई बातें मेरी यादों में चलती सी

कभी होता यक़ीं सा कुछ , कहीं कुछ बेयक़ीनी है

तुझे पाने की उम्मीदें कभी है हाथ मलती सी

कभी महफिल में तेरी रह के मै तनहा सा रहता हूँ

कभी तनहाइयों में संग पूरी भीड़ चलती सी

कभी बेबात ही ये ज़िंदगी वीरान लगती है

कभी बेजान साया देख के थोड़ी बहलती सी

कभी ये लड़खड़ाती है बहुत हमवार राहों मे

कभी ये ज़िन्दगी काटों में भी घिर के सँभलती सी

कभी ये शांत बहती है कोई गहरी नदी हो ज्यूँ

पहाड़ी सी नदी जैसी कभी बेहद उछलती सी  

*******************************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित 

Views: 1078

Comment

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Comment by वेदिका on April 10, 2014 at 7:43pm
बेहद खूबसूरत गजल लगी मुझे। आपकी रचनाओं में इसे सर्वश्रेष्ठ रचना कहना चाहती हूँ। लाजवाब कहन से लबरेज हर शेअर वजनदार।

कभी महफिल में तेरी रह के मै तनहा सा रहता हूँ
कभी तनहाइयों में संग पूरी भीड़ चलती सी//
फिर भी इस शेअर को कोट किया है।
बेहद दाद कुबूल कीजिये आ0 गिरिराज जी

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 10, 2014 at 6:27pm

आदरणीय मुकेश भाई , ग़ज़ल की सराहना  के लिये आपका दिली शुक्रिया !!

Comment by Mukesh Verma "Chiragh" on April 10, 2014 at 6:03pm

आदरणीय गिरिराज जी
बहुत सुंदर ग़ज़ल कही है आपने.. बहुत बहुत मुबारकबाद

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