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बस्ती में कोई बच्चा नहीं देखा - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

1222 1222 1222 1222

***

सियासत पूछ मत तुझमें पतन क्या-क्या नहीं देखा

बहुत  खुदगर्ज  देखे  हैं  मगर  तुझ  सा  नहीं  देखा

**

महज  कुर्सी को  दुश्मन से  करे तू लाख  समझौते

चरित तुझ सा  किसी का भी  यहाँ गिरता नहीं देखा

**

सपन में भी दिखा करती मुझे तो बस सियासत ही

सियासत से  मगर कच्चा  कोई  रिश्ता  नहीं  देखा

**

बराबर  बाटते   देखी   मुहब्बत  भी   समानों  सी

बड़ा-छोटा  करे  माँ  प्यार  का  हिस्सा  नहीं  देखा

**

डपटता भी  अगर है  तो  सुधर  जा की  नसीहत से

खुदा की  आँख  में  मैंने  कभी  गुस्सा  नहीं   देखा

**

ये जो  जम्हूरियत  कहते  लुटेरों  का  तमाशा  अब

यहाँ  मालिक  कहाता  जो  भला उसका  नहीं देखा

**

सुना  है  कल  सियासतदाँ चले  आए थे बस्ती में

‘मुसाफिर’ आज  बस्ती में  कोई बच्चा  नहीं देखा

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by Saurabh Pandey on May 1, 2014 at 1:29am

बहुत खूब भाईजी. 

हार्दिक शुभकामनाएँ .. .

Comment by Sachin Dev on April 11, 2014 at 12:54pm

आदरणीय लच्छ्मन धामी जी, एक बेहतरीन गजल के लिए हार्दिक बधाई आपको ! 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 11, 2014 at 10:46am

आदरणीय भं अन्नपूर्णा जी , आपकी प्रतिक्रिया और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद .

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 11, 2014 at 10:45am

आदरणीय भूवन भाई  ग़ज़ल की प्रशंसा के लिए दिली धन्यवाद .

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 11, 2014 at 10:42am

भाई विशाल जी ग़ज़ल की प्रशंसा के लिए हार्दिक आभार .

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 11, 2014 at 10:41am

भाई गिरिराज जी , आपको असआर पसंद आये यह मेरे लिए हर्ष का विषय है . मार्गदर्शन करते रहिये . हार्दिक धन्यवाद .

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 11, 2014 at 10:38am

आदरणीय राजेश बहन , आपकी दाद से असीमित ख़ुशी मिली .कमियों के बारे भी अवगत करते रहें . हार्दिक धन्यवाद .

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 11, 2014 at 10:36am

भाई कृष्णा सिंह जी, ग़ज़ल की प्रशंसा के लिए आभार . वह शब्द 'समानों ' ही है जो सामानों के सन्दर्भ में ही प्रयोग हुआ है .

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 11, 2014 at 10:31am

आदरणीय भाई जीतेन्द्र जी , ग़ज़ल पर आपकी प्रतिक्रिया से मन हर्षित हुआ . हार्दिक धन्यवाद .

Comment by annapurna bajpai on April 10, 2014 at 10:29pm

बहुत खूब ! इस सुंदर गजल हेतु बधाई स्वीकारें । 

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