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चाँद मुझे तरसाते क्यूँ हो ?

चाँद मुझे तरसाते क्यूँ हो ?

 

तुम सुंदर हो , तुम भोले हो

नटखट तुम हो बहुत सलोने ।

रूठ - रूठ जाते क्यूँ मुझसे ?

छुप छुप कर बादल के कोने ।

तुम बादल से झांक झांक कर, अपना रूप दिखाते क्यूँ हो

चाँद मुझे तरसाते क्यूँ हो ?

मुझसे स्नेह नहीं है, मानूँ –

तुम छुप जाओ नज़र न आओ ।

चंद्र बदन ढँक लो तुम अपना

मेरी बगिया नज़र न आओ ।

आँख मिचौली खेल खेल कर, रह रह मुझे रिझाते क्यूँ हो

चाँद मुझे तरसाते क्यूँ हो ?

इस आँगन मे आ इतराते

कभी झरोखे से झाँको तुम ।

ऐसा लगता मुझको हर पल –

मौन निमंत्रण हो देते तुम ।

ऐसी बात नहीं गर बोलो , चंद्र किरण बिखराते क्यूँ हो ?

चाँद मुझे तरसाते क्यूँ हो ?

.

----- मौलिक एवं अप्रकाशित -----

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Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 2, 2014 at 10:13pm

बहुत सुंदर, मनभावन रचना आदरणीय ब्रह्मचारी जी. हार्दिक बधाई स्वीकारें

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on April 2, 2014 at 8:08pm

बहुत सुन्दर गीत रचना | हार्दिक बधाई श्री ब्रह्मचारी जी 

Comment by annapurna bajpai on April 2, 2014 at 2:36pm

बहुत खूब !! आ0 ब्रम्ह्चारी जी , बधाई आपको इस रचना के लिए । 

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on April 2, 2014 at 8:38am
चंद्र, उसकी रूप लावण्यता तथा उसके कृत्यों से निर्मित अप्रतिम दृश्य का मनोहारी वर्णन किया है आपने। बधाई आदरणीय ब्रह्मचारी जी!
Comment by Dr Ashutosh Mishra on April 1, 2014 at 4:30pm

आदरणीय ब्रम्हचारी सर ...इसे रचना को गुनगुनाने में बहुत आनंद आया ..मेरी तरफ से तहे दिल बधाई स्वीकार करीं सादर 

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on April 1, 2014 at 11:28am

ऐसा लगता मुझको हर पल –

मौन निमंत्रण हो देते तुम ।

ऐसी बात नहीं गर बोलो , चंद्र किरण बिखराते क्यूँ हो ?

चाँद मुझे तरसाते क्यूँ हो ?

नटखट  चाँद पर सुंदर रचना, हार्दिक बधाई 

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 1, 2014 at 11:04am

आ0 बृह्मचारी जी, वाह!  बहुत खूबसूरत भाव, अच्छा लगा। बधाई स्वीकारें।  सादर,

Comment by Neeraj Neer on April 1, 2014 at 9:26am

बहुत सुन्दर ..

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