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कह मुकरियाँ

(ये मेरा पहला प्रयास है )

प्रेम बूँद वो भर भर लाते

तपित हिये की प्यास बुझाते

मन मयूर मेरा उस पर पागल

क्या सखि साजन्, ना सखि बादल

 

कभी पेड़ों के पीछे से झाँके

कभी खिड़की से झाँक मुस्काए

हँस हँस के डाले है वो फंदा

क्या सखि साजन्, ना सखि चंदा

 

उम्मीदों की किरण जगाता

स्फूर्ति नई वो भर भर लाता

शुरु होता जीवन उससे मेरा

क्या सखि साजन्, ना सखि सवेरा

 

हर पल खिल खिल वो मुस्काए

दुख मे जीने की राह सूझाए

बिखरे राहो में कितने ही शूल

क्या सखि साजन्, ना सखि फूल

  ****************

महेश्वरी कनेरी

मौलिक /अप्रकाशित

Views: 471

Comment

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Comment by Maheshwari Kaneri on April 1, 2014 at 12:26pm

  हौसला अफजाई केलिए आप सभी का  बहुत बहुत आभार...

Comment by annapurna bajpai on March 31, 2014 at 11:25pm

बहुत बढ़िया एवं भाव पूर्ण कह मुकरियाँ हुई है आ0 माहेश्वरी जी । 

Comment by coontee mukerji on March 31, 2014 at 5:07pm

बहुत ही सुंदर.हार्दिक बधाई.

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 31, 2014 at 12:16pm

पहली और तीसरी कहमुकरिया बहुत सुन्दर लगी | अछा प्रयास | हार्दिक बधाई आदरणीया 

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