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बसंत तुम देर से क्यूं आये ? -- डॉ नूतन गैरोला


ये पतझड़ भी कैसा था
अबके बहुत लंबा
और शीत ?
घनी गहरी बरफ में
हर फूल दबे मुरझाये|
बसंत! तुमने क्यों कर न देखा
मिट्टी में घुटते वो नन्हें बीज
अंकुरित होने को जो थे व्याकुल |
पर खा गयी उन्हें
मौन हिमशिला सर्द|
और उस शीत का प्रेम देखो
पुनः पुनः वापस आया|
विडंबना तुम आये पर
देर से आये|
क्या खिल सकेगा
वो अंकुर
इन्तजारी में जो
दफ़न हुवा
भूमि के अंदर
एक अथाह भारी हिमखंड से
कुचला मृत प्रायः |
अबके बसंत में क्या पतझड खिलेगा,
खिलेगा तो खूब लड़ेगा कि
बसंत तुम देर से क्यों आये ?

डॉ नूतन गैरोला - ७ फरवरी २०११ २१:०३

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Comment by Dr Nutan on February 8, 2011 at 7:34pm
गणेश जी !! आपका सादर धन्यवाद
Comment by Shamshad Elahee Ansari "Shams" on February 8, 2011 at 7:21pm
बसंत का इतना भावभीना और रौषपूर्ण स्वागत...?? अनोखा अंदाज़ है और इंतज़ारी लफ़्ज़ आपने इजाद कर ही लिया...बधाई
Comment by रंजना सिंह on February 8, 2011 at 6:23pm

 

भावपूर्ण मनुहार.... 

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 8, 2011 at 2:09pm
वाह डॉ साहिबा, ऋतुराज बसंत के स्वागत मे बहुत ही खुबसूरत रचना प्रस्तुत किया है , कोटिश: बधाई स्वीकार करे |
Comment by Dr Nutan on February 8, 2011 at 12:43pm
धन्यवाद वंदना जी !!

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