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क्या तुम्हे भी...? (अतुकांत)

तुम बिन

तन्हा-तन्हा सी साँसें

पल-पल गुजरता रहा

वरष के जैसा

बेचैनी की धीमी-धीमी आग में

बसंत बीत ही गया

न जाने कैसे कटेगा..?

रंगों का महीना

तुम बिन तो है

बे-रंग सा फाल्गुन

दिन तो काटने ही हैं

इस तरह क्यों न थका लूँ तन को

कि शाम तक

चूर हो जाय !

ये तन्हा रातें

बिन करवट ही

बीत जायें ।

इस तन्हाई को मेरे भाग्य ने ही सौंपा है मुझे
क्या तुम्हें भी..?

      जितेन्द्र 'गीत'

 (मौलिक व् अप्रकाशित)

 

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Comment

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Comment by Neeraj Neer on March 5, 2014 at 8:24pm

बहुत  ही सुन्दर भावात्मक प्रस्तुति .. बधाई 

Comment by S. C. Brahmachari on March 5, 2014 at 6:23pm
फागुन मे तनहाई के दर्द को अच्छी अभिव्यक्ति दी है आपने, भाई जीतेंद्र जी ! बधाई !
Comment by kalpna mishra bajpai on March 5, 2014 at 6:09pm

सर, सुंदर रचना के लिए बहुत बधाई सादर !!!!!!!

Comment by Dr Ashutosh Mishra on March 5, 2014 at 5:46pm

आदरणीय जीतेन्द्र जी ..इस बेहतरीन प्रस्तुति के लिए तहे दिल बधाई स्वीकार करें ..सादर 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 5, 2014 at 4:36pm

इस तन्हाई को मेरे भाग्य ने ही सौंपा है मुझे 
क्या तुम्हें भी..

शायद 

सादर बधाई 

आदरणीय 

Comment by Sarita Bhatia on March 5, 2014 at 4:36pm

अच्छी प्रस्तुति आदरणीय ,बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 5, 2014 at 3:14pm

आदरणीय जीतेन्द्र भाई , बहुत सुन्दर ॥ अतुकांत रचना के लिये हार्दिक बधाइयाँ ॥

Comment by Shyam Narain Verma on March 5, 2014 at 3:06pm
बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति आदरणीय

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