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माँ तूने मुझे अभिमन्युं क्यूँ बनाया

सुनी थी वीरों कि कहानियाँ 

मुश्किलों से भरी बीती जिनकी जवानियाँ
संस्कारों कि दीवारों से घिरता रहा
लड़ता रहा और उलझता रहा
जय पराजय में पिसता रहा

कष्टो के तीरों से छलनी हुआ तन
हालातों के कांटो से घायल हुआ मन
पर मन ने चुनी हर चुभन
बस इन सबने मेरा साहस बढ़ाया
जब खुली आँख,मै दूर था निकल आया
साथ था तो बस केवल अपना साया
मन ने फिर वही सवाल दोहराया
माँ तूने मुझे अभिमन्यु क्यूँ बनाया

अब मानता हूँ कि तुम्हारा उपकार था
जीवन का सबसे मजबूत आधार था
हर मोड़ पर आगे बढ़ना सिखाया
पलटना कभी ना सिखाया
अनेक अनुभवो से भरा हूँ मै
खुद के साथ खड़ा हूँ मै
पर अब कोई और हूँ मै

होकर सबसे अलग
जीवन से मिला हूँ मै
आभार तेरा माँ
मुझे अभिमन्युं बनाया
पलटना ना सिखा कर
लक्ष्य तक पहुचना सिखाया

"मौलिक व अप्रकाशित"

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 25, 2014 at 5:56pm

आदरणीय पवन भाई , सुन्दर कविता के लिये आपको बधाई ॥

Comment by Shyam Narain Verma on February 24, 2014 at 5:24pm
इस भावपूर्ण कविता के लिए हार्दिक बधाई....

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