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लफ़्ज़ कब जज़्बात को पूरे पड़े ? ( ग़ज़ल ) गिरिराज भंडारी

2122     2122        212 ( पूरा ) 

 

इस फ़िज़ा के शोख नज़्ज़ारे भी देख

बाग  मे  पानी के  फौव्वारे भी देख

 

सिर्फ  सूखे  तू शज़र   देखा  न  कर

हो  रहे  पत्ते   हरे   सारे  भी   देख  

 

तू अमा में चाँद  खातिर , ज़िद  न कर        

आ कभी आकाश में तारे भी देख

सिर्फ  भारी रह सकूँ , ये सोच  मत  

कैसे उड़ते, हलके  गुब्बारे  भी  देख  

 

चन्द  हँसती  सूरतों  से  खुश न हो  

देख  आँसू , दर्द  के  मारे  भी  देख

 

जीत  से  कोई  नही  सीखा   कभी

ज़िन्दगी से हम कहाँ  हारे ,भी देख

 

लफ़्ज़ कब  जज़्बात  को  पूरे  पड़े ?

भीगती  आँखों  में  अंगारे भी देख  

 

********************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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Comment by शिज्जु "शकूर" on February 17, 2014 at 9:56pm

बेहतरीन ग़ज़ल आदरणीय गिरिराज सर बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by अनिल कुमार 'अलीन' on February 17, 2014 at 9:29pm

सिर्फ  भारी रह सकूँ , ये सोच  मत 

कैसे उड़ते, हलके  गुब्बारे  भी  देख 

चन्द  हँसती  सूरतों  से  खुश न हो 

देख  आँसू , दर्द  के  मारे  भी  देख.............बहुत खूब आदरणीय!

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