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ज़िंदगी कसौटियों पर कस कर

निखरती सी गई

जितनी ये तबाह हुई

उतनी संभरती सी गई

आदमियत और गद्दारी में आकर

घुलती सी गई

कभी ये राम,रहीम ,नानक

में बँटती सी गई

कभी ये सुरमई शामों में वीणाकी तरह

बजती सी गई

कभी बेगानों की तरह

कटती सी गई

कभी वादे कभी शोषण में

फँसती सी गई

कभी ये सारे बंधन तोड़ कर

बेदाग सी लगी

कभी ये अंगारों पर चल कर

दहकती सी लगी

कभी ये डगमगाते दीपक 

जैसे बुझती सी लगी

कभी ये सुनहरे तारों से बने

पिंजड़े सी लगी

कभी उसमें फंसा पाखी

जैसी बेबस सी लगी

ये ज़िंदगी तेरी एक -एक कठिनाई

मुझे कोहनूर सी लगी

जड़ाया जब उसे अंगूठी में

तो नगीने जैसी लगी

ये ज़िंदगी तू  पात -पात हर डाल-डाल

पर लिखी सी लगी

खग ,विहग,पखेरू के

कंठ में गीत सी लगी

कभी तू महकती चमेली

के फूलों सी लगी

कभी -कभी ये ज़िंदगी

बेरंग गंधहीन सी लगी

जितना कहूँ तेरे लिए

वो कम है क्योंकि

तू हर एक पल

पहेली सी लगी ।

कल्पना मिश्रा बाजपेई

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Meena Pathak on April 13, 2014 at 7:35am

बहुत बहुत सुन्दर ... बधाई 

Comment by savitamishra on February 23, 2014 at 7:12pm

सुन्दर रचना

Comment by kalpna mishra bajpai on February 23, 2014 at 9:36am

आप सब गुणी जनों का बहुत -बहुत आभार ।

Comment by annapurna bajpai on February 23, 2014 at 12:23am

बहुत बढ़िया !! सुंदर भाव , इस प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकारें आदरणीया कल्पना मिश्रा बाजपेई जी । 

Comment by kalpna mishra bajpai on February 21, 2014 at 9:26pm

आदरणीय प्राची जी बहुत बहुत शुक्रिया। आपके द्वारा मेरे लिए कहे गए शब्द आप के ह्रदय की विशालता को दर्शाते हैं  


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on February 21, 2014 at 8:22pm

जिन्दगी के सफ़र ..अलग अलग एहसासों को बहुत बारीकी से शब्दों में प्रस्तुत किया है 

हार्दिक बधाई 

Comment by kalpna mishra bajpai on February 20, 2014 at 4:09pm

आदरणीय नीरज जी आपका बहुत बहुत आभार। सर, आपसे निवेदन है की मुझे मेरी कमियों से औगत कराते रहिएगा 

Comment by बृजेश नीरज on February 19, 2014 at 11:42pm

सुन्दर रचना है! आपको हार्दिक बधाई!

Comment by kalpna mishra bajpai on February 19, 2014 at 3:36pm

आप सभी गुनिजनों का तहे दिल से शुक्रिया

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 19, 2014 at 9:40am

जितना कहूँ तेरे लिए

वो कम है क्योंकि

तू हर एक पल

पहेली सी लगी ।.............बहुत सुंदर, अंतिम पंक्तियों में आपने शायद जिन्दगी के सही पहलू का चित्रण किया

हार्दिक बधाई स्वीकारें आदरणीया कल्पना जी

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