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षडऋतु - दर्शन * संजीव 'सलिल

(आचार्य जी ने काफी व्यस्तता के वावजूद यह कृति इस परिवार हेतु भेजी है , बहुत बहुत धन्यवाद ...एडमिन)

 

षडऋतु - दर्शन

*

संजीव 'सलिल'

*

षडऋतु में नित नव सज-धजकर,

     कुदरत मुकुलित मनसिज-जित है.

मुदितकमल सी, विमल-अमल नव,

 

 

 

 

 

 

 

     सुरभित मलयज नित प्रवहित है.

नभ से धरा निहार-हार रवि,

     गुपचुप विस्मित थकित चकित है.                                                   

रूप अरूप, अनूप, अनूठा 

 

 

 

 

 

 

 

 

     'सलिल' मौन लख सुषमा अमित है.

*

षडऋतु का मनहर व्यापार.

कमल सी शोभा अपरम्पार.

रूप अनूप देखकर मौन-                                                                                                              

हुआ है विधि-हरि-हर करतार.

 

शाकुंतल सुषमा सुकुमार.

प्रकृति पुलकित ले बन्दनवार.

शशिवदनी-शशिधर हैं मौन-

नाग शांत, भूले फुंकार.

 

भूपर रीझा गगन निहार.

दिग-दिगंत हो रहे निसार.

निशा, उषा, संध्या हैं मौन-

शत कवित्त रच रहा बयार.

 

वीणापाणी लिये सितार.

गुनें-सुनें अनहद गुंजार.

रमा-शक्ति ध्यानस्थित मौन-

चकित लखें लीला-सहकार.

*

Views: 451

Comment

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Comment by Lata R.Ojha on February 21, 2011 at 1:06pm
manbhaavan rachna ' salil ji' :)
Comment by sanjiv verma 'salil' on February 21, 2011 at 9:45am

thanks arun.

 

Comment by Abhinav Arun on February 5, 2011 at 9:01am
मनोरम और रमणीक प्रस्तुति | आचार्य जी को नमन है |

कृपया ध्यान दे...

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