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धीरे-धीरे समझे हम

इस दुनिया के तौर तरीके

धीरे धीरे समझे हम

गुलदस्तों की ओट में खंजर

धीरे-धीरे समझे हम|  

जोश बड़ा था होश नहीं था

हद से आगे गुजरे हम

हद से आगे जो होता है  

धीरे-धीरे समझे हम|

 

जो भी मिल गए

अपने बन गए

रिश्ते खूब निभाये हम

रिश्तेदारों की हकीकत     

धीरे-धीरे समझे हम|

बीत गयी हर बात पुरानी

एक कहानी बन गए हम

 फंतासी हैं रिश्ते नाते

धीरे-धीरे समझे हम|

शहद समझकर हंसकर पी गए

जहर के कितने प्याले हम

किश्तों में फिर मौत का आना

धीरे-धीरे समझे हम| 

 

दर्पण का दिल चटक गया

जब इसके भीतर झांके हम

हजार मुखोटे एक चेहरे पर

धीरे-धीरे समझे हम| 

मेहनत करके हारा है जो

उसे नकारा समझे हम

मेहनतकश की पीर कहां है

धीरे-धीरे समझे हम| 

(मौलिक और अप्रकाशित) 

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Comment

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Comment by Gul Sarika Thakur on January 23, 2014 at 7:47pm

Bahut bahut Abhaar Sushil Sharma jee

Comment by Sushil Sarna on January 23, 2014 at 7:10pm

गहन भावों की बेहतरीन अभिव्यक्ति  .... अति अति अति सुंदर रचना   … हार्दिक बधाई 

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