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नैतिकता के पतन से, फैला कंस प्रभाव॥
मात- पिता सम्मान नहि, नस नस में दुर्भाव॥

पश्चिम संस्कृति जी रहे, हम भूले निज मान।
कहते हम संतान कपि, जबकि हैं हनुमान॥

निज गौरव को भूलकर, बनते मार्डन लोग।
ये भी क्या मार्डन हुए, पाल रहे बस रोग॥

अपने घर में त्यक्त है, वैदिक ज्ञान महान।
महा मूढ़ मतिमंद हम, करते अन्य बखान॥

लौटें अपने मूल को, जो है सबका मूल।
पोषित होता विश्व है, सार बात मत भूल॥

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by अरुन 'अनन्त' on January 23, 2014 at 12:20pm

आदरणीय त्रिपाठी भाई बेहद सुन्दर दोहावली रची है आपने एक एक दोहा सार्थक और सारगर्भित हैं बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by annapurna bajpai on January 23, 2014 at 12:15am

बहुत सुंदर दोहे आ0 विधयेशवरी जी । 

Comment by Sarita Bhatia on January 22, 2014 at 9:04pm

आदरणीय vindheshwari जी संस्कृति की चिंता करते सुन्दर दोहे ,हार्दिक बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 22, 2014 at 8:32pm

आदरणीय विन्ध्येश्वरी भी , भारतीय संकृति का मान बढ़ाते आपके दोहों के लिये बहुत बहुत बधाइयाँ ॥

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on January 22, 2014 at 6:55pm

सुन्दर , सार्थक और सारगर्भित दोहे रचे है | हार्दिक बधाई  श्री विन्ध्येश्वरी त्रिपाठी विनय जी  


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on January 22, 2014 at 6:54pm

आधुनिकता के कुछ साइड इफेक्ट को आपने बड़ी खूबसूरती से दोहों में ढाला है आदरणीय विंध्येश्वरी त्रिपाठी जी
लौटें अपने मूल को, जो है सबका मूल।
पोषित होता विश्व है, सार बात मत भूल॥

बहुत ही सार्थक संदेश दिया है आपने आपको बहुत बहुत बधाई इस दोहावली के लिये

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