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ग़ज़ल - (रवि प्रकाश)

बहर-ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ (8 गुरु)
.
गलियों-गलियों गाना भी है।
रस्ते में मैख़ाना भी है॥
.
नफ़रत की मारामारी में,
चाहत का पैमाना भी है।
.
अपनी कुटिया के पीछे ही,
उनका दौलतख़ाना भी है।
.
लाखों हैं कनबतियाँ लेकिन,
नैनों का टकराना भी है।
.
दोपहरें अलसाएँ तो क्या,
भोरों का इठलाना भी है।
.
कितने बल हैं पेशानी पर,
परियों का शरमाना भी है।
.
झूठों की हाँडी के नीचे,
सच का आतिशख़ाना भी है।
.
आने वाले कल का दुखड़ा,
इस पल का इतराना भी है।
.
ग़ैरों की रेलमपेलों में,
इक जाना-पहचाना भी है।
.
घुँघरू बाँधे मीरा नाचे,
काशी का मस्ताना भी है।
.
अंधों-कानों की नगरी में,
नज़रों का नज़राना भी है।
.
चमकीले पुतलों के पीछे,
जोगी वाला बाना भी है।
.
दिन की बातें कहते-सुनते,
साँझों में घर जाना भी है॥
.
-मौलिक व अप्रकाशित।
-06.12.2013

Views: 1006

Comment

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Comment by Ravi Prakash on January 18, 2014 at 8:23am
Thanks a lot Gumnaam Ji.
Comment by gumnaam pithoragarhi on January 17, 2014 at 6:41pm

bahut khoob kahaa hai sir badhai aaplo..........

 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 19, 2013 at 12:41am

भाई जी.. वाह ! खूब खूब !

आपने ग़ाफ़ (गुरु) के चार जोड़े लिये हैं. वैसे कहते हैं कि मिसरों के वज़्न में गुरु (ग़ाफ़ या दीर्घ) विषम संख्या में हों तो गेयता में और प्रवाह आ जाता है. 

एक भली कोशिश के लिए बहुत-बहुत बधाई.. .

Comment by Ravi Prakash on December 11, 2013 at 6:31pm
Thanks a lot Vijay Ji.
Comment by विजय मिश्र on December 11, 2013 at 4:58pm
बेहतरीन और अन्दाज भी तजा तरीन . बधाई रविजी .
Comment by Ravi Prakash on December 11, 2013 at 10:34am
सराहना तथा उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।
Comment by ram shiromani pathak on December 10, 2013 at 10:33pm

सुन्दर गज़ल के लिये हार्दिक बधाई भाई जी  !!!!

Comment by Ravi Prakash on December 10, 2013 at 10:04pm
ज़र्रानवाज़ी के लिए शुक्रिया रवि जी।
Comment by Atendra Kumar Singh "Ravi" on December 10, 2013 at 8:26pm

चमकीले पुतलों के पीछे,
जोगी वाला बाना भी है।

क्या बात कही है आदरणीय रवि जी .....हार्दिक बधाई

Comment by Ravi Prakash on December 10, 2013 at 7:05pm
धन्यवाद तपन जी।

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