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प्यार में होता सदा ही दर्द क्यों है ?

प्यार में होता सदा ही दर्द क्यों है ?

यह जमाना हो गया बेदर्द क्यों है ?

है बिना दस्तक चला आता सदा जो

वो बना यूँ आज फिर हमदर्द क्यों है ?

छू रही है रूह मेरी आते जाते

यह तुम्हारी साँस इतनी सर्द क्यों है ?

अपनी यादों को समेटे जब गए हो

आज यादों की उठी फिर गर्द क्यों है ?

प्यार पर करता जुल्म हर रोज है जो

वो समझता खुद को जाने मर्द क्यों है ?

तुम समझती हो मुहब्बत जिसको सरिता

वो बना तेरे लिए सरदर्द क्यों है ?

............मौलिक व अप्रकाशित ............

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Comment

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Comment by Sarita Bhatia on December 5, 2013 at 12:01pm

सभी गुनीजनों का हार्दिक आभार ,मैं दोबारा से यह गजल संशोधित कर डालती हूँ मार्गदर्शन करते रहें 

Comment by Saarthi Baidyanath on December 4, 2013 at 12:06pm

शिल्प में चूक होना सामान्य बात है ...! बड़े बड़े लोगों से भी हो जाती है , सीखना अत्यावश्यक है !आपके सराहनीय प्रयास को नमन करता हूँ ! 

Comment by नादिर ख़ान on December 4, 2013 at 11:24am

शुक्रिया शिज्जु शकूर जी ...

आभार....

Comment by नादिर ख़ान on December 4, 2013 at 11:22am

आदरणीया सरिता जी, हम भी इस मंच के माध्यम से सीख रहे है ।

हमारा गज़ल ज्ञान आपसे भी कम है, इसलिये मार्गदर्शक नहीं, अपनी कक्षा का सहपाठी ही समझें ।

आभार....


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 3, 2013 at 11:35pm

आदरणीय सरिता जी यहाँ ईता दोष है आपकी रचना ग़ज़ल होते होते रह गई 

//इसलिये बाकी के शेर मेंकाफिया हमदर्द,सरदर्द तो ठीक है,// जनाब नादिर साहब हमदर्द और सरदर्द हमकाफिया नही हो सकते

//पर क्या हम यहाँ क़ाफ़िया सर्द ,गर्द,मर्द use कर सकते हैं?// जी हाँ यहाँ आप सही हैं

Comment by Sarita Bhatia on December 3, 2013 at 7:25pm

आदरणीय सुशील सरना जी हार्दिक आभार 

Comment by Sarita Bhatia on December 3, 2013 at 7:24pm

आदरणीय डॉ गोपाल जी हार्दिक आभार 

Comment by Sarita Bhatia on December 3, 2013 at 7:21pm

आदरणीय नादिरखान जी शुक्रिया मार्गदर्शक बने रहें 

Comment by Sarita Bhatia on December 3, 2013 at 7:19pm

शुक्रिया राम भाई 

Comment by Sarita Bhatia on December 3, 2013 at 7:19pm

आदरणीय गिरिराज जी शुक्रिया मार्गदर्शन के लिए ,बाकी गुनीजनों की राय का मुझे भी इंतज़ार है 

कृपया ध्यान दे...

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