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"एक लाख पचपन हजार..  एक

एक लाख पचपन हजार..  दो

एक लाख पचपन हजार..  तीन ..."

अधिकारी महोदय ने जोर से लकड़ी का हथौड़ा मेज पर दे मारा. रघुराज ठेकेदार की तरफ देखते हुए वे धीरे से मुस्कुरा दिए.

रघुराज ठेकेदार ने भी आँखों ही आँखों में अधिकारी महोदय को मुस्कुराते हुए अपनी सहमति जतायी और अपने मित्र मोहन के कंधे पर हाथ रख धीरे से बोल उठे,  ''ओये मोहन्या..चल भाई, हम भी अब अपना काम करें. अधिकारी महोदय के लिए पूरा इंतजाम करना है ''

दोनों खुश-खुश नीलामी स्थल से बाहर निकल गये...

 

जितेन्द्र ' गीत '

( मौलिक व् अप्रकाशित )

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Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on December 8, 2013 at 11:22am

मेरा ''सौभाग्य''...यह संयोग बना :-))

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on December 8, 2013 at 11:00am

आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया हेतु ,आपका बहुत बहुत आभार आदरणीय सुरेन्द्र जी,स्नेह बनाये रखियेगा

सादर!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 8, 2013 at 10:56am

हार्दिक धन्यवाद, भाई जितेन्द्रजी.. . :-))

शुभ-शुभ

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on December 8, 2013 at 10:51am

आदरणीय सौरभ जी, आपका हृदय से आभार. स्नेहिल मार्गदर्शन बनाये रखियेगा

सादर!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 8, 2013 at 1:56am

वाह रे हक़ीक़त का रूप ! एक आम हो गये गँठजोड़ को बहुत करीने से प्रस्तुत किया है आपने जीत भाई.

हार्दिक बधाई !

इसी तरह लिखते रहें ..

शुभेच्छाएँ

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on December 6, 2013 at 10:52pm

प्रिय जितेन्द्र जी हकीकत को बयाँ करती सशक्त लघु कथा.…… क्या ये घोल मेल कभी सुधरेगा भी ?
जय श्री राधे
भ्रमर ५

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on December 6, 2013 at 9:13am

रचना पर आपकी प्रतिक्रिया से लेखनकर्म को सार्थकता का प्रमाण मिलता है, आपका हृदय से आभार आदरणीय शुभ्रांशु जी, स्नेह बनाये रखियेगा

सादर!

Comment by Shubhranshu Pandey on December 5, 2013 at 11:23am

सब कुछ कितना सुव्यवस्थित लगता है लकिन...... एक पंक्ति ने व्यवस्था की पेंच खोल दी...सुन्दर कथा

सादर. 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on December 4, 2013 at 11:02pm

लघुकथा पर आपकी स्नेहिल प्रतिक्रिया हेतु,आपका हार्दिक आभार आदरणीया वंदना जी

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on December 4, 2013 at 10:48pm

आदरणीय चंद्रशेखर जी, आपकी दोबारा स्नेहिल प्रतिक्रिया से मन को बहुत संतोष मिलता है

सादर!

कृपया ध्यान दे...

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