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बड़ी बातें मियां छोड़ों

१२२२     १२२२

बड़ी बातें मियां छोड़ों 

हमारा दिल न यूं तोड़ों

न हिन्दू है न वो मुस्लिम 

वो हिंदी है उसे जोड़ो 

छलकती हैं जहाँ आँखें 

मुझे रिन्दों वहां छोड़ों 

लगें दिलकश जो  शाखों पे 

हसीं गुल वो नहीं तोड़ों 

मिलेगी वक़्त पर कुर्सी 

मियाँ कुर्सी को मत दौड़ों 

लुटी कलियाँ चमन की हैं 

दरिंदों को नहीं छोड़ों 

बचा कुर्सी वतन बेंचा 

शरारत ये जरा छोड़ों 

जहर है अब हवाओं में 

हवा का आज रुख मोड़ों 

मौलिक व अप्रकाशित 

डॉ आशुतोष मिश्र 

Views: 851

Comment

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Comment by Sushil.Joshi on October 24, 2013 at 7:26pm

भाव अच्छे हैं लेकिन शब्द लेखन में कुछ कमी सी लग रही है आ0 डॉ. आशुतोष जी....

Comment by डॉ. अनुराग सैनी on October 21, 2013 at 11:24pm

शब्द संयोजन और भाव अच्छे है | इस हेतु बधाई 

Comment by annapurna bajpai on October 21, 2013 at 6:46pm

आ0 आशुतोष मिश्रा जी छोटी बह्र मे बहुत ही बढ़िया गजल हुई है बधाई आपको । 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 21, 2013 at 12:10pm

आदरणीय वीनस जी ...आपकी प्रतिक्रिया मेरे ग़ज़ल लिखने के मेरे प्रयास को सतत ही एक नयी दिशा देती  हैं ..आप सभी से तमाम पहलुओं पर आपनी चूक का अहसास हुआ .....हमारे अच्छे प्रयास पर आप की हौसला अफजाई मिली ..जैसे ही लापरवाही हुई आपने सजग कर दिया ..सतत सुधार की अपनी चेष्टा के साथ नयी नयी कमियां भी उजागर होती हैं और उन पर आपकी राय फिर एक नयी दिशा देती है ...आपको हार्दिक धन्यवाद के साथ ..सादर 

Comment by वीनस केसरी on October 21, 2013 at 1:56am

आदरनीय
अगर ये ग़ज़ल है तो गज़लियत क्यों नदारद है ... मुझे ये ग़ज़ल कम तुकबंदी जियादा लगी
मज़ा तो तब है जब एक शेर में कई पहलू मौजूद हों ,,, हर बार पढ़ा जाए तो नया अर्थ प्रस्फुटित हो ... आपकी यह रचना ऐसा करने में समर्थ नहीं है

साथ ही तोडो छोडो के साथ दौड़ो को भी आपने भर दिया है

Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 20, 2013 at 11:28am

आदरणीय शिज्जू जी ..काफिया का दुहराव न हो मैं हमेशा ध्यान रखता हूँ ....आप सभी सेजब भी कुछ नया सीखने को मिलता है तो अगली ग़ज़ल में ध्यान उसी बिंदु पर ज्यादा केन्द्रित हो जाता है. ..काफिया देखता हूँ तो तमाम दोषों से ध्यान हट जाता है ..दोष देखता हूँ तो कुछ ऐसे मूलभूत बिन्दुओं से ध्यान बिकेंद्रिकृत हो जाता है ..आप सभी बिद्वत जन मेरे ग़ज़ल की राह पर मेरे चलना सीखने के गवाह बने रहें और मेरे लडखडाते क़दमों को स्थिरता हेतु हौसला  प्रदान करते रहें  ..अंतस की इन्ही भावनाओं के और सादर नमन के साथ  

Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 20, 2013 at 11:18am

आदरणीय सौरभ सर ..सर ये अनुस्वार daudon, chhodon  टाइप करने की गलती से हो गया ..टाइप करते समय मैं ध्यान नहीं दे पाया ..सर वाकई काफिया की पुनरावृत्ति से ग़ज़ल के लुत्फ़ में कमी आयी  ....मैं लगातार कोशिस कर रहा हूँ की आप सभी से मुझे जो भी मार्गदर्शन मिल ता है उसका मैं अपने अगले प्रयास में ध्यान रहूँ..पर हर बार कुछ न कुछ गलती मुझसे हो ही जाती है  ग़ज़ल में कमी आपके स्नेहिल मार्गदर्शन में सतत कम होती ही जायेगी 

बस मेरी तो यही ख्वाइश है की आपका  स्नेह मुझे यूं ही सतत मिलता रहे ..उसमे कभी कोई कमी न हो ...सादर प्रणाम के साथ 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 20, 2013 at 11:02am

आदरणीय बैद्य नाथ जी,  गिरिराज जी , अभिनव जी ,  शकील जी आप सभी का हौसला अफजाई के लिए शुक्रिया ...आप सभी को सादर धन्यवाद के साथ 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on October 20, 2013 at 10:19am

आदरणीय डॉ आशुतोष जी छोटी बह्र पे कोशिश अच्छी है, मैं जनाब शकील साहब से सहमत हूँ, काफिया का दोहराव लुत्फ़ को कम किये दे रहा है, ग़ज़लों पर सतत प्रयास रचनाओं को बेहतर और बेहतर करेगा, शुभकामनाएं


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 19, 2013 at 11:49pm

छोड़ों तोड़ों दौड़ों मोड़ों.. .इन क्रियाओं में अनुस्वार क्यों लगा है . स्पष्ट नहीं हुआ आदरणीय

ले दे के कुछ ही काफ़ियाओं का कई दफ़े आना काफ़िया का अकाल माना जाता है.

वैसे कई लोग इस प्रस्तुति से बहुत प्रभावित दीख रहे हैं. मैं उनके विरुद्ध नहीं जाना चाहता. लेकिन फिर भी, मैं बहुत संतु्ष्ट नहीं हो पाया, सर.

सादर

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