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कैकई के मोह को

पुष्ट करता

मंथरा की

कुटिल चाटुकारिता का पोषण

 

आसक्ति में कमजोर होते दशरथ

फिर विवश हैं

मर्यादा के निर्वासन को

 

बल के दंभ में आतुर

ताड़का नष्ट करती है

जीवन-तप  

सुरसा निगलना चाहती है

श्रम-साधना

एक बार फिर

 

धन-शक्ति के मद में चूर

रावण के सिर बढ़ते ही जा रहे हैं 

 

आसुरी प्रवृत्तियाँ

प्रजननशील हैं

 

समय हतप्रभ

धर्म ठगा सा आज है फिर

 

राम ! तुम कहाँ हो ?

‌‌‌‌‌‌‌‌‍=====================

--बृजेश नीरज

(मौलिक व अप्रकाशित)

 

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Comment by बृजेश नीरज on October 11, 2013 at 7:25pm

आदरणीय गिरिराज जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by बृजेश नीरज on October 11, 2013 at 7:24pm

आदरणीया वंदना जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by Abhinav Arun on October 11, 2013 at 1:11pm

आसुरी प्रवृत्तियाँ

प्रजननशील हैं

 

समय हतप्रभ

धर्म ठगा सा आज है फिर...अच्छी रचना ,,हार्दिक शुभकामनायें !!

Comment by aman kumar on October 11, 2013 at 9:46am

थोडा से विस्तार और होता तो ........पर अच्छी रचना नीरज भाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 11, 2013 at 8:01am

आदरणीय नीरज भाई , बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति !!! सुदर रचना !!! हार्दिक बधाई !!!

Comment by vandana on October 11, 2013 at 7:14am

बहुत बढ़िया रचना बहुत बहुत बधाई आदरणीय बृजेश जी 

बल के दंभ में आतुर

ताड़का नष्ट करती है

जीवन-तप  

सुरसा निगलना चाहती है

श्रम-साधना

एक बार फिर    

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