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गजल: जहन में कैद है जो याद इक पिछली नहीं जाती

बह्र: 1222/1222/1222/1222

मुकर जाने की आदत आज भी उनकी नहीं जाती
तभी तो उनके घर पर अब तवायफ भी नहीं जाती


सियासत किस तरह से घुल गई फिरकापरस्ती में
चमन में लीडरों के अब कोई तितली नहीं जाती

ये सुनकर उम्र भर रुसवा रहा अपनी मुहब्बत से
कभी भी उठ के स्टेशन से इक पगली नहीं जाती

पढ़ेंगे लोग तो कहने लगेंगे बेवफा तुझको
कई बातें गजल में आज भी लिक्खी नहीं जाती

सितम से ऊब कर तेरा शहर मैं छोड़ दूं कैसे
सितम से जूझती है पर कहीं दिल्ली नहीं जाती

नया आगाज तेरे साथ करना चाहता हूं पर
जहन में कैद है जो याद इक पिछली नहीं जाती

-शकील जमशेदपुरी
—————————————————
*मौलिक एंव अप्रकाशित

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Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on October 8, 2013 at 9:48pm

आदरणीय शकील भार्इ जी, वाह !  शानदार गजल।  हार्दिक बधार्इ स्वीकारें ।  सादर,


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on October 8, 2013 at 9:41pm

//पढ़ेंगे लोग तो कहने लगेंगे बेवफा तुझको
कई बातें गजल में आज भी लिक्खी नहीं जाती//
बेहतरीन शकील भाई दाद कुबूल करें

Comment by annapurna bajpai on October 8, 2013 at 6:18pm

नया आगाज तेरे साथ करना चाहता हूं पर
जहन में कैद है जो याद इक पिछली नहीं जाती............................ खूबसूरत अशअर , दाद कुबूल फरमाए अ0 शकील जमशेदपुरी जी । 

Comment by शकील समर on October 8, 2013 at 6:15pm

हौसला बढ़ाने के लिए बहुत—बहुत शुक्रिया आदरणीय विजय मिश्र, गिरिराज भंडारी और अभिनव अरुण सर।

Comment by विजय मिश्र on October 8, 2013 at 6:03pm
बहोत कमाल की शायरी , तहेदिल से शुक्रिया .खास तौर से ये दो मिसरे तो दिमाग को खप्तुलहवास कर दे -
"ये सुनकर उम्र भर रुसवा रहा अपनी मुहब्बत से
कभी भी उठ के स्टेशन से इक पगली नहीं जाती |"

"पढ़ेंगे लोग तो कहने लगेंगे बेवफा तुझको
कई बातें गजल में आज भी लिक्खी नहीं जाती |" भाई मेरे , लाजवाब !!!

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 8, 2013 at 5:55pm

आदरणीय शकील भाई , पूरी ग़ज़ल लाजवाब कही आपने , हर शेर उम्दा !!! दिली दाद कुबूल करें !!!

नया आगाज तेरे साथ करना चाहता हूं पर
जहन में कैद है जो याद इक पिछली नहीं जाती ------------------------ क्या बात है , शकील भाई !!!!

Comment by Abhinav Arun on October 8, 2013 at 5:18pm

बेहतरीन ग़ज़ल हर शेर बोल रहा है ..नायाब ग़ज़ल के लिए दिली मुबारकबाद शकील जी !!

Comment by शकील समर on October 8, 2013 at 4:42pm

आभार आपका आदरणीय अरुन शर्मा अनंत साहब।

Comment by अरुन 'अनन्त' on October 8, 2013 at 4:34pm

वाह भाई वाह बेहतरीन ग़ज़ल पेश की है आपने सभी अशआर पसंद आये खास कर इन अशआरों पर विशेष दाद कुबल फरमाएं.

पढ़ेंगे लोग तो कहने लगेंगे बेवफा तुझको
कई बातें गजल में आज भी लिक्खी नहीं जाती .. वाह

सितम से ऊब कर तेरा शहर मैं छोड़ दूं कैसे
सितम से जूझती है पर कहीं दिल्ली नहीं जाती ... क्या कहने गज़ब

Comment by शकील समर on October 8, 2013 at 4:00pm

आभार आपका आदरणीय राज बुन्दॆली साहब इस हौसलाअफजाई के लिए।

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