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मन के उपजे कुछ हाइकू  आपके समक्ष --

मन के भाव

शांत उपवन में 

पाखी से उड़े .

उड़े है  पंछी

नया जहाँ बसाने

नीड है खाली ।

मन की पीर

शब्दों की अंगीठी से

जन्मे है गीत।

सुख औ दुःख

नदी के दो किनारे

खुली किताब।

मै का से कहूँ

सुलगते है भाव

सूखती जड़े।

मोहे न जाने

मन का सांवरिया

खुली पलकें

मन चंचल

बदलता मौसम

सर्द रातों में।

मन उजला

रंगों की चित्रकारी

कलम लिखे।

मौलिक और अप्रकाशित

 

-- शशि पुरवार

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 11, 2013 at 7:34pm

प्रिय शशि जी 

बहुत सुन्दर हायकू.... हार्दिक बधाई 

दूसरे और तीसरे हायकू में पंक्तियों की एक दूसरे पर निर्भरता है..वो पूर्णतः स्वतंत्र नहीं हैं.. मुझे ऐसा लगता है . पुनःदेखिएगा 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 11, 2013 at 6:53pm

आदरणीय शशि जी , उम्दा हाईकू !! बधाई !!

Comment by vandana on September 11, 2013 at 6:24am

सभी हाइकु प्रभावी हैं आदरणीया शशि जी 

Comment by वीनस केसरी on September 11, 2013 at 1:44am

बहुत खूब

Comment by annapurna bajpai on September 10, 2013 at 10:50pm

सुंदर हाइकु बहुत बधाई आपको । आ0 शशि जी ।

Comment by Parveen Malik on September 10, 2013 at 7:05pm
मन पर आधारित सुंदर हाइकु.... बधाई !

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