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स्‍वाति सी कोई कथा-कहानी

चातक का इक शहर, लिखो ना

कसमस करती

इक अंगड़ाई

गुनगुन गाता

भ्रमर, लिखो ना

चैताली वो रात सुहानी

शारद-शारद

डगर, लिखो ना

किसी कास की शुभ्र हँसी में

होती कैसी लहर, लिखो ना

इक देहाती

कोई दुपहरी

पीपल की

कुछ सरर, लिखो ना

शीशे सा वो

थिरा-थिरा जल

अनमुन बहती

नहर, लिखो ना

पारिजात की भीनी खुशबू

धिमिद धिमिद वो ठहर, लिखो ना

हंसी-ठिठोली

करती राधा

सुर में गाता

अमर, लिखो ना

पूजन सा वो

खिला समर्पण

मंदिर सा वो

जिगर, लिखो ना

तितली भरी किताबों जैसी

उड़गन की कुछ खबर, लिखो ना

सामवेद की

शाखा छूकर

आयी पहली

प्रहर, लिखो ना

केसरिया कुछ

सांझ सुहानी

जुगनू वाले

शज़र, लिखो ना

महुए का वो रग-रग छूना

गुड़ सा पकता उमर, लिखों ना

(सर्वथा मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by राजेश 'मृदु' on September 11, 2013 at 2:30pm

आदरणीय राजेश कुमारी जी एवं ब्रजेश नीरज जी, आपने ठीक पकड़ा है कि गुड़ सी पकती उमर होना चाहिए, मुझसे गलती हुई इस हेतु क्षमा प्रार्थी हूं, सादर

Comment by राजेश 'मृदु' on September 11, 2013 at 2:30pm

आदरणीय राजेश कुमारी जी एवं ब्रजेश नीरज जी, आपने ठीक पकड़ा है कि गुड़ सी पकती उमर होना चाहिए, मुझसे गलती हुई इस हेतु क्षमा प्रार्थी हूं, सादर

Comment by राजेश 'मृदु' on September 11, 2013 at 2:28pm

आप सभी सुधी जनों का हार्दिक आभार, आपका प्रोत्‍साहन यूं ही मिलता रहे, सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 10, 2013 at 4:03pm

आ० राजेश झा जी 

बहुत खूबसूरत गीत..वाह 

हर बंद एक बेहद सुन्दर शब्द चित्र उकेरता है..आनंद आ गया ..बहुत बहुत बधाई 

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on September 8, 2013 at 4:41pm

बेहतरीन ..क्या कहने .. बधाई!

Comment by Meena Pathak on September 7, 2013 at 11:51pm

महुए का वो रग-रग छूना

गुड़ सा पकता उमर, लिखों ना........क्या बात,क्या बात, क्या बात !!
बहुत बहुत बधाई इस अद्वितीय रचना हेतु, सादर

Comment by बृजेश नीरज on September 7, 2013 at 10:38pm

वाह! अति सुन्दर! बहुत अच्छा गीत! आपको हार्दिक बधाई!

इस पंक्ति में मुझे कुछ संशय है।

//गुड़ सा पकता उमर//

कि ‘गुड़ सी पकती उमर’

क्या सही होगा?

 

Comment by mrs manjari pandey on September 7, 2013 at 10:22pm

     आदरणीय राजेश जी अच्छी रचना के लिये बधाई !

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on September 7, 2013 at 9:59pm

इक देहाती

कोई दुपहरी

पीपल की

कुछ सरर, लिखो ना

शीशे सा वो

थिरा-थिरा जल

अनमुन बहती

नहर, लिखो ना

पारिजात की भीनी खुशबू

धिमिद धिमिद वो ठहर, लिखो ना..........बहुत ही प्रभावी भाव,

बहुत बहुत बधाई आदरणीय राजेश जी

Comment by vijay nikore on September 7, 2013 at 9:06pm

 रचना अच्छी लगी। बधाई, आदरणीय राजेश जी।

 

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