For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

रुसवाईयां ही रुसवाईयां
दूर तलक गम की
कोई ख़ुशी नही है अब
चैन कहाँ मिले...

परछाईयां ही परछाईयां
हर वक़्त अतीत की
कोई  भोर नही है अब
रोशनी कहाँ मिले...

अंगड़ाईयां ही अंगड़ाईयां
रोज एक थकन की
कोई आराम नही है अब
कहाँ शाम ढले...

तन्हाईयां ही तन्हाईयां
इस अकेलेपन की
कोई साथ नही है अब
जीना है अकेले...


न ख़ुशी न सुकून
न आराम
न साथ किसी का
फिर भी जिए जा रहा हूँ....

जितेन्द्र ' गीत'
(मौलिक व् अप्रकाशित)

Views: 781

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on September 13, 2013 at 12:05am

आपने रचना को सराहा, आपका बहुत बहुत आभार आदरणीय देवेन्द्र भाई

सादर!

Comment by Devendra Pandey on September 12, 2013 at 2:52pm

Bahut Sundarr 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on September 5, 2013 at 9:12pm

रचना पर भावों को स्पष्ट करती हुयी आपकी विस्तृत प्रतिक्रिया से मन को बड़ी ख़ुशी व् लेखनी को अति मनोबल मिला, आपका दिली आभार आदरणीय बृजेश जी, आशीर्वाद व् स्नेह बनाये रखियेगा

सादर!

Comment by बृजेश नीरज on September 5, 2013 at 2:22pm

मन के एकाकीपन में सब व्यर्थ सा ही लगता है। सब बोझिल सा, जहां उम्मीद की किरन बहुत मुश्किल से प्रवेश कर पाती है। ऐसे पलों को बहुत अच्छे से शब्द देने का प्रयास किया है आपने।
आपको हार्दिक बधाई!
सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on September 3, 2013 at 1:05am

सच कहा आपने गीतिका जी, जीवन में ऐसा समय आता है जब इन्सान को निराशा ही निराशा दिखती है, और ऐसे समय के दौरान इन्सान बहुत सी मूल्यवान निधि को खो देता है, परन्तु इन सबका कारण अहम नही होता, क्योकि जब प्रेम में विरह वेदना होती है तो इन्सान का विश्वास डगमगाने लगता है, विरह इन्सान के मन में प्रेम को कमजोर व् अविश्वास को बढाने लगता है, वह अविश्वास में अँधा होने लगता है, जैसे की प्रेम को पाकर अँधा होता है,

इन कारणों से सारे समर्पण, सुंदर क्षण, पुर्वमिलन की खुशियाँ सब उसे मानसिक रूप से परेशान करने लगते है,और उसे हर तरफ से निराशा घेर लेती है,

रचना पर आपकी विस्तृत प्रतिक्रिया ने, लेखनकर्म के प्रति आत्मबल को दोगुना कर दिया,आपका बहुत बहुत आभार गीतिका जी,

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on September 1, 2013 at 10:31pm

आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया से लेखनकर्म के प्रति मनोबल दोगुना हुआ, दिली आभार आपका आदरणीय अरुण अनंत जी

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on September 1, 2013 at 9:34pm

आपने रचना पर अपना अमूल्य समय दिया, आपका बहुत बहुत आभार आदरणीय सुरेन्द्र जी

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on September 1, 2013 at 9:31pm

आपकी उत्साहबर्धक प्रतिक्रिया से रचना सार्थक हुयी, आपका बहुत बहुत आभार आदरणीया विजयश्री जी

सादर!

Comment by वेदिका on September 1, 2013 at 4:57pm

जीवन मे ऐसे क्षण आते है कि सकारात्मकता सम्मुख होते हुये भी हम उसके होने को महसूस नहीं कर पाते| क्यूकी उस समय मन निराशाओं से घिरा हुआ रहा करता है तो वह एकांत के पार कुछ भी नही देख ने को राजी होता| ऐसी मनः स्थिति मे रह कर हम अपने जीवन के सौंदर्य और आनंद कि मूल्यवान निधि को खो देने के स्तर पर आ जाते है| इसका कारण कई बार अहम भी हो सकता है| 

देव! 

किसलिए तू व्यग्र है देव!

देख!

समर्पण समग्र है देव!

देव!

मै नही यहाँ वहाँ देव !

देख!

तू ही यत्र, तत्र है देव!

देव!

इस क्षणों और विचारों को व्यक्त करती हुईं आपकी भावमय पंक्तियों पर शत शत शुभकामनायें स्वीकारिए जितेंद्र गीत जी!! 

Comment by अरुन 'अनन्त' on September 1, 2013 at 11:59am

आदरणीय जीतेंद्र भाई जी प्रेम में विरह से उत्पन्न ह्रदय के भावों को सुन्दरता से पिरोया है आपने दिल से बधाई स्वीकारें इस सुन्दर अभिव्यक्ति पर.

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आ. भाई सुशील जी , सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर सुंदर दोहा मुक्तक रचित हुए हैं। हार्दिक बधाई। "
Sunday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आदरणीय अजय गुप्ताअजेय जी, रूपमाला छंद में निबद्ध आपकी रचना का स्वागत है। आपने आम पाठक के लिए विधान…"
Sunday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आदरणीय सौरभ जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार आदरणीय जी ।सृजन समृद्ध हुआ…"
Sunday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आदरणीय सौरभ जी सृजन आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया से समृद्ध हुआ । आपका संशय और सुझाव उत्तम है । इसके लिए…"
Sunday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"  आदरणीय सुशील सरना जी, आयोजन में आपकी दूसरी प्रस्तुति का स्वागत है। हर दोहा आरंभ-अंत की…"
Sunday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"  आदरणीय सुशील सरना जी, आपने दोहा मुक्तक के माध्यम से शीर्षक को क्या ही खूब निभाया है ! एक-एक…"
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२१२२/२१२२/२१२ **** तीर्थ  जाना  हो  गया  है सैर जब भक्ति का हर भाव जाता तैर जब।१। * देवता…See More
Sunday
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"अंत या आरंभ  --------------- ऋषि-मुनि, दरवेश ज्ञानी, कह गए सब संतहो गया आरंभ जिसका, है अटल…"
Saturday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"दोहा पंचक  . . . आरम्भ/अंत अंत सदा  आरम्भ का, देता कष्ट  अनेक ।हरती यही विडम्बना ,…"
Saturday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"दोहा मुक्तक. . . . . आदि-अन्त के मध्य में, चलती जीवन रेख ।साँसों के अभिलेख को, देख सके तो देख…"
Saturday
vijay nikore commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"नमस्ते, सुशील जी। आप से मिली सराहना बह्त सुखदायक है। आपका हार्दिक आभार।"
Saturday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा एकादश. . . . . पतंग

मकर संक्रांति के अवसर परदोहा एकादश   . . . . पतंगआवारा मदमस्त सी, नभ में उड़े पतंग । बीच पतंगों के…See More
Jan 14

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service