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दिया द्वार पर जूझ रहा

कितने कितने सूरज चमके

पर अँधियारा शेष रहा

तेरे मेरे मन के अंदर

इक संशय फल फूल रहा।।

 

सरपत के ढेरों झाड़ उगे

तन छू ले कट जाता है

इन बबूल के काँटों से भी

भीतर तक छिल जाता है

सावन की बौछारों में भी

मन उपवन सब सून रहा।।

 

तुम मिलते हो मुझको जैसे

इक गुजरी तरुणाई सी

भाव खिलें डाली पर कैसे

वह रूखी मुरझाई सी

साज संवार व्यर्थ रहा सब

धूल भरा यह रूप रहा।।

 

चिड़ियों ने भी पंख समेटे

हवा हुई अनजानी सी

नदिया की लहरें व्याकुल हैं

मछली कुछ अकुलानी सी

तूफानों के इस मौसम में

दिया द्वार पर जूझ रहा।।

-        बृजेश नीरज

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by बृजेश नीरज on August 5, 2013 at 10:24am

आदरणीय जितेन्द्र जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 5, 2013 at 10:03am

"चिड़ियों ने भी पंख समेटे

हवा हुई अनजानी सी

नदिया की लहरें व्याकुल हैं

मछली कुछ अकुलानी सी

तूफानों के इस मौसम में

दिया द्वार पर जूझ रहा।।"...........बहुत ही गहरे भाव समेटे हुयी पंक्तियाँ,

बहुत सुंदर रचना, आदरणीय बृजेश जी, हार्दिक बधाई आपको 

Comment by बृजेश नीरज on August 5, 2013 at 9:28am

आदरणीय नीरज जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by Neeraj Nishchal on August 5, 2013 at 8:47am

तूफानों के इस मौसम में

दिया द्वार पर जूझ रहा।

बहुत ही गहरी बात
कह दी आपने .......

Comment by बृजेश नीरज on August 4, 2013 at 9:15pm

आदरणीया विनीता जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by Vinita Shukla on August 4, 2013 at 8:04pm

सुंदर भावयुक्त, प्रभावी अभिव्यक्ति. बधाई.

Comment by बृजेश नीरज on August 4, 2013 at 7:11pm

आदरणीय माथुर जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by D P Mathur on August 4, 2013 at 7:03pm

चिड़ियों ने भी पंख समेटे

हवा हुई अनजानी सी

नदिया की लहरें व्याकुल हैं

मछली कुछ अकुलानी सी

तूफानों के इस मौसम में

दिया द्वार पर जूझ रहा।।

आदरणीय नीरज सर प्रणाम , सदा की तरह सुन्दर पंक्तिँयों को समेटे आपकी इस रचना के लिए आपको बधाई !   

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