मेरे दादाजी को श्रद्धांजली स्वरूप कुछ पंक्तियाँ
पिता!
तुम छत थे
ढह गये
तीव्र उम्र तूफान से
दरक गयीं दीवारें
लगाव ख़त्म
आपसदारी 'थी'
'है' नही
न कोई बचाव
धूप से
या बारिश से
शीत से
या गैरों से
न रहा घर
रह गया ढेर
ईंटों का
तुम थे 'एक छत'
हम 'चार दीवारें'
मिटा दिया हमने
अहसास
तुम्हारे होने का
तुम गये, शेष
एक प्रश्न
अवशेष
क्या दीवार के साये में
सुकून होगा
छत के साये सा ?
- गीतिका 'वेदिका'
मौलिक/ अप्रकाशित
Comment
आदरणीय अभिनव अरुण जी!
आपका कथन अकाट्य सत्य है,, बुजुर्गों की दी हुयी सीखें ही जीवन के सर्वाइव को आसान बनाती है|
सादर !!
आपका आभार स्नेही राम भैया! आपने रचना को सराहा
आदरणीया राजेश कुमारी जी!
आपका प्रदाय सम्बल आपके बडप्पन को दर्शाता है, आपके स्नेह की सदैव कृतग्य हूँ
सादर!
आदरणीय सौरभ जी!
आपकी प्रतिक्रिया संतोष प्रदान करने वाली है, इस सुखद पुरुस्कार हेतु आभार हूँ!
सादर !
आपका आभार आदरणीया अन्नपूर्णा जी!
आपने रचना को सराहा !
आदरणीया मीना पाठक जी!
आपके सुविचार मेरी रचना को सार्थकता देते है!
आभार
सादर गीतिका 'वेदिका'
आदरणीया श्याम नारायण जी!
आपने रचना सराह कर मुझे कृतग्य किया|
सादर!
जिस ओट में छाँव मिलती है वही नियामत. इस रचना की पवित्रता ने मुग्ध किया है.
बधाई
बुजुर्गों का स्नेह और आशीर्वाद भाग्यवानो को मिलता है आदरणीया गीतिका जी ... और वह थाती है आने वाले वक्त के थपेड़ो से जूझने में बल देता है ...सुन्दर भावपूर्ण रचना के हार्दिक साधुवाद स्वीकारें और वंदना के in स्वरों में हम सबके स्वर आपके साथ ही शामिल हैं !!! सुन्दर कृति !!
आदरणीया महिमा जी!
आदरणीय लक्ष्मण जी!
आदरणीय जितेन्द्र जी!
आपका बहुत बहुत आभार आपने रचना को के भाव को समझा
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