For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ग़ज़ल - (रवि प्रकाश)

-एक दुधमुँहा प्रयास-
बहर -ऽ।ऽऽ ऽ।ऽऽ ऽ।ऽऽ ऽ।ऽ

.

पाँव कीचड़ से सने हैं और मंज़िल दूर है।
शाम के साए घने हैं और मंज़िल दूर है॥


तुम मिलोगे फिर कहीं इस बात के इम्कान पे,
फास्ले सब रौंदने हैं और मंज़िल दूर है॥

कौन हो मुश्किलकुशा अब कौन चारागर बने,
घाव ख़ुद ही ढाँपने हैं और मंज़िल दूर है॥

कल बिछौना रात का सौगात भारी दे गया,
अब उजाले सामने हैं और मंज़िल दूर है॥

धड़कनें भी मापनी हैं थामनी कंदील भी,
रास्ते फिर बाँचने हैं और मंज़िल दूर है॥

क्या सफ़र का हौंसला फिर क़ातिलों के गाँव में,
आज तम्बू तानने हैं और मंज़िल दूर है॥

नींद के माहौल में क्यों बोझ पलकों पर नहीं,
दीप सारे अनमने हैं और मंज़िल दूर है॥

इन मुसलसल भटकनों में बदहवासी का समां,
प्राण भी अब झोंकने हैं और मंज़िल दूर है॥

संग छोड़ेंगी 'रवी' क्यों ज़िल्लतें क्यों क़िल्लतें,
अब हक़ीक़त सामने है और मंज़िल दूर है॥

मौलिक व अप्रकाशित।

Views: 721

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Ravi Prakash on August 1, 2013 at 3:36pm
शुक्रिया सौरभ जी।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 1, 2013 at 12:47am

भाई आपके दुधमुँहें प्रयास ने मन मोह लिया.  बहुत बहुत बधाई लें.. .

मक्ता के उला-ए-मिसरे को एक बार फिर से देख लें. रवि के वि पर भार दे कर उसे गुरु बनाना उचित नहीं. उसी मिसरे में ऐसी गलती एक और बार हुई है.

शुभेच्छाएँ.

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 27, 2013 at 9:02pm

आदरणीय  रवि जी , सुंदर  गजल ....दाद  कुबूल कीजिये 

Comment by Ravi Prakash on July 26, 2013 at 1:48pm
सराहना के लिए कोटि-कोटि धन्यवाद!!
Comment by विजय मिश्र on July 26, 2013 at 1:01pm
कौन हो मुश्किलकुशा अब कौन चारागर बने,
घाव ख़ुद ही ढाँपने हैं और मंज़िल दूर है॥
.
.
.
संग छोड़ेंगी 'रवि' ये ज़िल्लतें न क़िल्लतें,
अब हक़ीक़त सामने है और मंज़िल दूर है॥
--कितनी बारीकी से आज के हालातों की नुमाइंदगी करता है ! बेहतरीन लिखा है.हार्दिक आभार रविजी .
Comment by वेदिका on July 26, 2013 at 12:33pm

वाह वाह बहुत सुंदर है गज़ल,,

पाँव कीचड़ से सने हैं और मंज़िल दूर है।
शाम के साए घने हैं और मंज़िल दूर है॥,,,, क्या कहने, दमदार शुरुआत     

धड़कनें भी मापनी हैं थामनी कंदील भी,
रास्ते फिर बाँचने हैं और मंज़िल दूर है॥,,

बहुत खूब अशआर रचे आपने, बधाई लीजिये!!   

Comment by Ravi Prakash on July 26, 2013 at 6:41am
नज़रे-इनायत के लिए शुक्रिया वीनस जी। मार्गदर्शन करते रहें।
Comment by वीनस केसरी on July 26, 2013 at 3:07am

नींद के माहौल में क्यों बोझ पलकों पर नहीं,
दीप सारे अनमने हैं और मंज़िल दूर है॥

वाह वा भाई क्या कहने ...
शानदार
इस सफल प्रयास के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें

हाँ सम्भालनी (२२१२) का शुद्ध उच्चारण सँभालनी (१२१२) होता है इसलिए इस मिसरे को सही करना होगा
बाकी तो सब वाह वा है ..

Comment by Dr Ashutosh Mishra on July 25, 2013 at 11:23pm

behtareen ghazal ke liye badhayee sweekarein ..sadar

Comment by अरुन 'अनन्त' on July 25, 2013 at 10:23pm

भाई जी बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल हुई है सभी अशआर बेहद सुन्दर बन पड़े हैं, निम्नांकित अशआरों हेतु विशेषतौर पर बधाई स्वीकारें.

कल बिछौना रात का सौगात भारी दे गया,
अब उजाले सामने हैं और मंज़िल दूर है॥ वाह वाह

इन मुसलसल भटकनों में बदहवासी का समां,
प्राण भी अब झोंकने हैं और मंज़िल दूर है॥ बेहतरीन लाजवाब

संग छोड़ेंगी 'रवि' ये ज़िल्लतें न क़िल्लतें,
अब हक़ीक़त सामने है और मंज़िल दूर है॥ बेहद सुन्दर

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Admin replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"स्वागतम"
5 hours ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आदरणीया रिचा यादव जी नमस्कार बहुत शुक्रिया हौसला अफ़ज़ाई का "
6 hours ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"क्या गिला गर किसी को भूल गया इश्क़ में जो ख़ुदी को भूल गया अम्न का ख़्वाब देखा तो था पर क्या करुँ रात…"
6 hours ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आदरणीय तिलक राज कपूर जी नमस्कार बहुत- बहुत धन्यवाद आपका आपने समय निकाला ग़ज़ल तक आए और ऐसी बेहतरीन…"
6 hours ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आदरणीय अजय गुप्ता 'अजेय' जी नमस्कार बहुत धन्यवाद आपका आपने समय दिया आपने सहीह फ़रमाया गुणी…"
6 hours ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक…"
6 hours ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"अम्न का ख़्वाब देखा तो था पर क्या करुँ रात ही को भूल गया "
6 hours ago
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"इस सुझाव को विशेष रूप से रूहानी नज़रिये से भी देखेंहुस्न मुझ पर सवार होने सेशेष सारी कमी को भूल…"
8 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आ. भाई दयाराम जी, अभिवादन व आभार।"
10 hours ago
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"हार्दिक आभार आदरणीय "
11 hours ago
Richa Yadav replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आदरणीय दयाराम जी नमस्कार  बहुत शुक्रिया आपका  सादर "
13 hours ago
Richa Yadav replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आदरणीय तिलक जी सादर अभिवादन  बहुत बहुत धन्यवाद आपका  बहुत अच्छे सुझाव हैं ग़ज़लमें निखार…"
13 hours ago

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service