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दर्पण पे जमी हो धूल तो श्रृंगार कैसे हो,

भूखा हो जब आदमी तो प्यार कैसे हो .

पढ़ लिख कर सब बन गए दफ्तर के बाबू ,

खेतों में अनाज की अब पैदावार कैसे हो .

मंहगाई को जीद है अब छूने को आसमां,

गरीबों के घर तीज और त्यौहार कैसे हो .

मतलब नहीं है देश के आदमी को देश से,

राम जाने इस देश का बेड़ा पार कैसे हो .

ले चल मुझे अब दूर कहीं मुर्दों के शहर से ,

मुर्दों के शहर में गजल का कारोबार कैसे हो.

. ……. नीरज कुमार ‘नीर’

मेरी यह रचना पूर्णतः मौलिक एवं अप्रकाशित है .

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Comment

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Comment by विजय मिश्र on July 17, 2013 at 12:57pm
आज के हैरान सी परेशान आम जिंदगी को शब्द दिए हैं आपने . एक कसमसाहट तो छोड़ता ही है ,आज की हकीकतों से रूबरू भी कराता है आपकी यह सार्थक रचना .
"मतलब नहीं है देश के आदमी को देश से,
राम जाने इस देश का बेड़ा पार कैसे हो ? " -- यह तो आज सम्पूर्ण जागरूक समाज के समक्ष एक ज्वलन्त प्रश्न है और गंभीर चिन्तन का विषय भी . रचना में निहित आह्वान आपकी रचना से भी सबल है .नीरजजी ,आपके कविरूप को प्रणाम .
Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 17, 2013 at 12:04pm

सुन्दर भाव रचना प्रस्तुति के लिए बधाई 

पढ़ लिख कर सब बन गए दफ्तर के बाबू ,

खेतों में अनाज की अब पैदावार कैसे हो ---------पढ़ लिख कर तुम बनो न बाबू 

                                                            खेती को उन्नत करे, तो पढ़ाई सार्थक हो 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 17, 2013 at 8:00am

आ० नीरज जी,

सादर अनुरोध है कि, आप कृपया बहर भी साथ ही लिख दें, ताकि लय समझ में आ सके.

कृपया ध्यान दे...

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