For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

नाद- लय की ये नदी फिर सूखती क्यों है ?

नाद- लय की ये नदी, फिर सूखती क्यों है?
निःशब्द बहती चेतना, फिर डूबती क्यों है?

है अधूरी जिंदगी ,सारे सवालों के जवाब 
वो पहाड़े याद कर, फिर भूलती क्यों है ?

जब पवन जल अग्नि, आकाश धरती से 
है जन्म लेती मूरतें, फिर टूटती क्यों है ?

जान कर भी जो कभी, लौट कर आया नहीं
ये बावरी तृष्णा उसे, फिर ढूँढती क्यों है ?

खूब रोता दिल अकेले, में समझने के लिये 
समझे जिसे थे जिंदगी ,फिर रूठती क्यों है ?

है समंदर आसमाँ में, और जमीं बेचैन है 
चीख़ वो बेआवाज़ सी, फिर गूँजती क्यों है ?

-ललित मोहन पन्त 
4. 07.2013
00.27

मौलिक और अप्रकाशित

Views: 640

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by वीनस केसरी on July 11, 2013 at 2:12am

सुन्दर प्रयास .. सफलता की सीढ़ी ..

Comment by बृजेश नीरज on July 5, 2013 at 6:02pm

इस सुंदर अभिव्यक्ति के लिए आपको हार्दिक बधाई!
सादर!

Comment by dr lalit mohan pant on July 4, 2013 at 11:29pm

सर्वप्रथम मैं सभी सुधी मित्रों का आभारी हूँ जो आपने मुझ जैसे नवांकुर की इस रचना को अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रिया के  योग्य समझा 

… प्रशंसा और प्रोत्साहन की  इस सुखद अनुभूति के लिये भी मैं अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ ….वेदिका जी ! नाद का शाब्दिक अर्थ तो ध्वनि होता है पर अनाहत/अनहद  नाद  ही ब्रह्म  है जो इस मृदा को चेतना देता है और हमें उस अनंत यात्रा का यात्री बनाता है ऐसी आध्यात्मिक अध्येताओं की धारणा है जो मुझ जैसे अकिंचन की आस्था के सूत्र का एक सिरा … न यह कोई विधा है न ही कोई शीर्षक 

…… अपनी स्थूलबुद्धि से जो समझा हूँ उसे आप को संप्रेषित करनेमें सफल न हो पाया हूँ तो क्षमा करेंगी …     

Comment by सानी करतारपुरी on July 4, 2013 at 11:26pm

ललित जी  .. बढ़िया ग़ज़ल कही है  .. मुबारकबादबाद 

Comment by MAHIMA SHREE on July 4, 2013 at 10:28pm

नाद- लय की ये नदी, फिर सूखती क्यों है?
निःशब्द बहती चेतना, फिर डूबती क्यों है?....वाह


है समंदर आसमाँ में, और जमीं बेचैन है 
चीख़ वो बेआवाज़ सी, फिर गूँजती क्यों है ?....बहुत ही सुंदर प्रस्तुति . .आत्मा -शरीर, जीवन -मरण से जुड़े तमाम प्रश्न सभी संवेदनशील मनुष्य के मन में चलते ही रहते हैं ... आप ने उसे बड़ी रोचकता  से बाँधा हैं और खूबसूरती से प्रस्तुत किया है  ..बहुत -२ बधाई

Comment by coontee mukerji on July 4, 2013 at 6:09pm

एक दर्दभरी रचना है.ललीत जी प्रकृति हमें अपनी सीमा परिद्दि से समय समय पर अवगत कराती रहती है......पर हम हैं कि सुनकर अनसुनी कर देते हैं.

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 4, 2013 at 4:33pm

बहुत सुन्दर रचना के माध्यम से अनुत्तरित प्रश्न किये है आपने | इनके उत्तर में बस यही कहा जा सकता है -

जितनी चाबी भरी राम ने, उतना चले खिलौना 

अच्छी रचना के लिए बधाई श्री ललित मोहन पन्त जी 

Comment by Neeraj Nishchal on July 4, 2013 at 3:03pm

जनाब ललित मोहन जी शायद ही कोई तारीफ हो
जो आपकी कविता के साथ इन्साफ कर पाए .....
और शायद ही कोई समझ हो जो आपकी समझ
से ताल मेल बिठा पाए ..........
बहुत ही उम्दा और गहरा लिखा ....एक कवि कि ये दिली
तमन्ना रहती है की कोई उस भाव में डूब कर उस कविता
को पढ़े जिस भाव में उसने लिखी है ..........
पर ये गहराई हर किसी को नही मिलती .......

Comment by राजेश 'मृदु' on July 4, 2013 at 1:49pm

वाह-वाह आनंद आ गया, हर एक पंक्ति पर हमारी तरफ से आपकी जय हो का उदघोष कर रहा हूं । आपकी जय हो

Comment by रविकर on July 4, 2013 at 9:06am

अति सुन्दर-
बधाई आदरणीय-

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"चौपाई * बन्द शटर हैं  खुला न ताला।। दृश्य सुबह का दिखे निराला।।   रूप  मनोहर …"
1 hour ago
Chetan Prakash replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"शुभ प्रभात,  आदरणीय! चौपाई छंद:  भेदभाव सच सदा न होता  वर्ग- भेद कभी सच न…"
6 hours ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"चौपाई छंद +++++++++ करे मरम्मत जूते चप्पल। काम नित्य का यही आजकल॥ कटे फटे सब को सीता है। सदा…"
6 hours ago
Admin replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"स्वागतम"
18 hours ago
Admin posted discussions
18 hours ago
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . . घूस

दोहा सप्तक. . . . . घूसबिना कमीशन आजकल, कब होता है काम ।कैसा भी हो काम अब, घूस हुई है आम ।।घास घूस…See More
Wednesday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . . प्यार

दोहा सप्तक. . . . प्यारप्यार, प्यार से माँगता, केवल निश्छल प्यार ।आपस का विश्वास ही, इसका है आधार…See More
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ. भाई चेतन जी, उत्साहवर्धन व स्नेह के लिए आभार।"
Sunday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय "
Sunday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ.लक्ष्मणसिह धानी, 'मुसाफिर' साहब  खूबसूरत विषयान्तर ग़ज़ल हुई  ! हार्दिक …"
Feb 15
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ. भाई चेतन जी, सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर सुंदर मुक्तक हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Feb 15
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Feb 15

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service