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यूँ पाठ जिंदगी का पढ़ाने का शुक्रिया
की बेरुखी से मुझको भुलाने का शुक्रिया

गुज़रे हुए निशान कुछ रेती पे पैर के
यादें यूँ अपनी छोड़ के जाने का शुक्रिया

कोई तो चाहिए ही था इक हमसफ़र तुझे
दिल में किसी को और बसाने का शुक्रिया

रातों से हो गयी है मुहब्बत सी अब हमें
ख्वाबों में ही दीदार कराने का शुक्रिया

दिल मोम का है सोंच के रोता रहा सदा
पत्थर कि तरहा दिल को बनाने का शुक्रिया

मुझको लगा ये काफ़िला मेरे ही साथ है
अब तक यूँ मेरे साथ में आने का शुक्रिया

हसरत नही कि जिंदगी ताबील हो “ऋषी” 
दो पल ही सही साथ निभाने का शुक्रिया

अनुराग सिंह “ऋषी”


मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Anurag Singh "rishi" on June 19, 2013 at 1:09pm

बहुत बहुत शुक्रिया आप सभी का
ह्रदय से आभार

Comment by vijayashree on June 14, 2013 at 9:03pm

सुदर भावों से रूबरू कराने पर शुक्रिया .

Comment by coontee mukerji on June 14, 2013 at 1:20am

रातों से हो गयी है मुहब्बत सी अब हमें
ख्वाबों में ही दीदार कराने का शुक्रिया................क्या  बात है.

.दिल मोम का है सोंच के रोता रहा सदा
पत्थर कि तरहा दिल को बनाने का शुक्रिया.........बहुत सुंदर कहा / सादर / कुंती

Comment by Anurag Singh "rishi" on June 13, 2013 at 4:06pm

मै आप सभी का आभार व्यक्त करता हूँ तथा धन्यवाद भी ज्ञापित करता हूँ आशा है ये स्नेह ऐसे ही प्राप्त होता रहेगा
सुझावों हेतु ह्रदय से धन्यवाद
सादर
अनुराग सिंह "ऋषी"

Comment by बृजेश नीरज on June 12, 2013 at 10:14pm

आपके प्रयास पर आपको बधाई! 

Comment by Roshni Dhir on June 12, 2013 at 12:24pm

बहुत अच्छा लगा आपकी गज़ल पढकर ..

युही लिखते रहिये 

आभार 

Comment by राजेश 'मृदु' on June 11, 2013 at 6:19pm

आनंद आ गया आपकी रचना को पढ़कर । वीनस जी बात पर गौर करें तो और भी शानदार गज़ल आप लिख कर हमें आनंदित कर सकते हैं, सादर

Comment by Shyam Narain Verma on June 11, 2013 at 5:00pm

सुदर अभिव्यक्ति............................

Comment by वीनस केसरी on June 11, 2013 at 11:42am

क्या कहने भाई जी वाह वा शानदार कहन और सुन्दर भाव के साथ अच्छी ग़ज़ल कही है 

हाँ कुछ मिसरों की लय पर पुनः गौर कर लें 

सादर 

Comment by Anurag Singh "rishi" on June 11, 2013 at 8:50am

ह्रदय से आभार व्यक्त करता हूँ आपका सर एवं हौसला अफजाई के लिए धन्यवाद आपको
सादर

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