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बिन तेरे//आबिद अली मंसूरी

कितने तल्ख हैँ लम्हे
तेरे प्यार के वगैर
यह ग़म की आंधियां
यह तीरगी के साये
जैसे कोई ख़लिश
हो हवाओँ मेँ..
डसती हैँ मुझको पल-पल
पुरवाइयां
तेरी यादोँ की
बे रंग सी लगती है
ज़िंदगी अब तो
कुछ भी तो नहीँ जैसे
इन फिज़ाओँ मेँ...बिन तेरे!

(मौलिक व अप्रकाशित)

__आबिद अली मंसूरी

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Comment

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Comment by Abid ali mansoori on June 5, 2013 at 9:03pm
आदरणीया कुंती जी हार्दिक आभार,नमन आपको!__आबिद
Comment by coontee mukerji on June 5, 2013 at 7:05pm

आबीद जी,छोटी सी मन को छूती सुन्दर कृति.........................यह ग़म की आंधियां
यह तीरगी के साये
जैसे कोई ख़लिश
हो हवाओँ मेँ........सादर / कुंती

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on June 5, 2013 at 7:04pm
आदरणीय आबिद साहब..आभार आपका
Comment by Abid ali mansoori on June 5, 2013 at 6:35pm
आदरणीय श्याम जी,आदरणीय राम जी और आदरणीय जितेन्द्र जी आप सभी का हार्दिक आभार इस स्नेह के लिए!
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on June 5, 2013 at 5:35pm
बहुत खूबसूरत रचना..बहुत खूब लिखा आपने आबिद साहब "हार्दिक बधाई "
Comment by ram shiromani pathak on June 5, 2013 at 5:18pm

सुन्दर रचना आदरणीय ///हार्दिक बधाई 

Comment by Shyam Narain Verma on June 5, 2013 at 4:37pm
बहुत बहुत बधाई इस सुन्दर रचना के लिए ……………..

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