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बिन तेरे//आबिद अली मंसूरी

कितने तल्ख हैँ लम्हे
तेरे प्यार के वगैर
यह ग़म की आंधियां
यह तीरगी के साये
जैसे कोई ख़लिश
हो हवाओँ मेँ..
डसती हैँ मुझको पल-पल
पुरवाइयां
तेरी यादोँ की
बे रंग सी लगती है
ज़िंदगी अब तो
कुछ भी तो नहीँ जैसे
इन फिज़ाओँ मेँ...बिन तेरे!

(मौलिक व अप्रकाशित)

__आबिद अली मंसूरी

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Comment by Abid ali mansoori on June 9, 2013 at 2:16pm
आदरणीया प्रियंका जी हार्दिक आभार आपका!
Comment by Priyanka singh on June 9, 2013 at 12:22am

दिल पे चोट खाने का,कोई मौसम नहीँ होता!.........सुन्दर .....बधाई 

Comment by Abid ali mansoori on June 6, 2013 at 12:04pm
बहुत खूब आदरणीया राजेश कुमारी जी,हार्दिक आभार आपका स्नेहपूर्ण प्रतिक्रिया के लिए!

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 6, 2013 at 11:06am

कितने तल्ख हैँ लम्हे
तेरे प्यार के वगैर
यह ग़म की आंधियां
यह तीरगी के साये----कोमल एहसास को जीती पंक्तियाँ ये प्रस्तुति सच में तारीफ की हक़दार है इनको पढ़कर अपनी बहुत पुरानी एक ग़ज़ल का मुखड़ा  याद आया ---इन फूलों में अब नमी न रही तेरे जाने के बाद 

                    गुलशन  में तब  कमी न रही तेरे आने के बाद 
Comment by Abid ali mansoori on June 6, 2013 at 9:53am
आदरणीय विजय मिश्र जी हृदय से आभार आपको,नमन!
Comment by विजय मिश्र on June 6, 2013 at 9:44am
कविता छोटी मगर वजूद का विस्तार इतना बृहद की ..... आनंद आ गया आबिद भाई,
बधाई आपको .
Comment by Abid ali mansoori on June 6, 2013 at 9:14am
आदरणीय सौरभ जी हार्दिक आभार आपका!

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 6, 2013 at 7:43am

बढिया है..

Comment by Abid ali mansoori on June 5, 2013 at 9:36pm
आदरणीय संदीप जी हृदय से आभार आपको!
Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on June 5, 2013 at 9:21pm

क्या बात है कम शब्दों में सुन्दर भाव पूर्ण प्रस्तुति के लिए बधाई हो आपको 

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