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कहता है नर सदियों से
‘’ हे नारी !
पड़े सागर तल में
सीप में जो मोती द्वय
या ‌‌– तुम्हारे दो नयन हैं ! .
तुम रूपजाल हो या –
तुम्हारे अंग – अंग में
प्रकृति अटकी हुई है .’’
नारी कहती है
हे नर !
‘’ मैं ही अक्ष हूँ .
मैं ही आँसू
मोती भी
और सीप भी हूँ -
तुम्हारे लिये ही
मैं रोती हूँ, हँसती हूँ,
सजती हूँ, गाती हूँ
समझो न मुझे तुम रूपजाल
मैं प्रकृति की छाया हूँ
मही मेरी जननी है ‘’
( नर-नारी जन्म-जन्मान्तरों से हैं
एक दूसरे के हृदय में विराजमान
कभी रूप कभी रस तो कभी गंध
बन, खिले मुरझाए हैं जीवन वन )

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Comment by Saurabh Pandey on May 8, 2013 at 4:51am

पस्पर विश्वास ही पूरक होने की आ्वस्ति का मूल हैं. इस तथ्य की रोचक प्रस्तुति हुई है.

सादर बधाई, आदरणीया.

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 7, 2013 at 7:47pm

आदरणीया कुन्ती जी,  वाह!  क्या खूब?  शानदार, आत्मा-परमात्मा का सुन्दर मिलन,  एकाकार-कस्तूरी सा एहसास।  तहेदिल से हार्दिक बधाई स्वीकारें।  सादर,

Comment by Usha Taneja on May 7, 2013 at 7:00pm

आदरणीया  coontee mukerji जी, 

तुम्हारे लिये ही
मैं रोती हूँ, हँसती हूँ,
सजती हूँ, गाती हूँ
समझो न मुझे तुम रूपजाल 
मैं प्रकृति की छाया हूँ
मही मेरी जननी है ‘’

मन को छू गई है.

मर्मस्पर्शी कविता अच्छी लगी. 

बधाई!

Comment by manoj shukla on May 6, 2013 at 6:06pm
इस सुन्दर अभिव्यक्ति पर बधाई स्वीकार करें आदर्णीया
Comment by Shyam Narain Verma on May 6, 2013 at 1:23pm
इस प्रस्तुति हेतु बहुत-बहुत बधाई व शुभकामनाएँ.
Comment by vijay nikore on May 6, 2013 at 12:45pm

आदरणीया कुंती जी:

 

नर-नारी की गुत्थियों की सुन्दर अभिव्यक्ति।

बधाई।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by coontee mukerji on May 6, 2013 at 12:11pm

बहुत बहुत धन्यवाद , आदरणिय प्रदीप जी .

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on May 6, 2013 at 12:07pm

bahut hii sundr abhivyakti hetu 

hardik badhai swikar karen mahodya ji 

saadr 

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