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जन जन के संताप........कुण्डलिया

सरकारें अब खेलती, यह शतरंजी खेल
ऊँट ऊँट मे मित्रता, हाँथी कसी नकेल
हाँथी कसी नकेल, बजीर हुआ अंजाना
घोडा तिरछी चाल, चले तो पाये दाना
कहते है कविराय, लडा के सबको मारेँ
प्यादों मे तकरार , कराती है सरकारें
----------
कोटा पर जो मिल रहा, चावल चीनी तेल
उसमे क्या क्या हो रहा, कैसा कैसा खेल
कैसा कैसा खेल, खेलते हैं व्यापारी
जीता कोटेदार, बिचारी जनता हारी
कहते हैं कविराय, लगाओ दस दस शोंटा
ठगने खातिर आज, उठाते हैं जो कोटा
-----
चाँदी आलू हो गये, स्वर्ण भये हैं प्याज
बिन काटे ही बह रहे, अश्रु नयन से आज
अश्रु नयन से आज, रो रही दुनिया सारी
नही भोजन के साथ, मिलेगी अब तरकारी
रहे सोच कविराय, बही ये कैसी आँधी
जन जन तो है त्रस्त, नफाखोरों की चाँदी
----------
मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Dr.Prachi Singh on April 24, 2013 at 7:27pm

सुन्दर कुंडलिया छंद आ० मनोज शुक्ला जी 

प्यादों मे तकरार , कराती है राजनीति

जन जन तो त्रस्त, नफाखोरों की चाँदी

उपरोक्त दोनों पंक्तियों का पुनः अवलोकन कर लें ..सादर.

Comment by manoj shukla on April 24, 2013 at 1:31pm
आदर्णीय केवल प्रसाद जी आपका सादर आभार....अंतिम पंक्ति.....जन जन तो है त्रस्त, नफाखोरो की चाँदी
Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 24, 2013 at 10:05am

आ0  मनोज जी,  समसामयिक कुण्डलियां अच्छी हैं। एक बार मात्रा फिर से देख लें।   बधाई स्वीकारे।  सादर,

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