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ग़ज़ल-शख़्स जब वो इधर से गुजरा है

शख़्स जब वो इधर से गुजरा है
एक पत्थर जरूर पिघला है।


दिल मेरा बार-बार धडका है,
क्यूँ मुझे कोई डर सा रहता है।


मेरा महबूब मेरा इतना है,
ज़िन्दगी भर की कोई आशा है।


चाँदनी आज और बढ गई है,
चाँद पर कोई जाके बैठा है।


कौन समझा है इस सियासत को,
इस सियासत का राज़ गहरा है।


आदमी कपडे तो पहनता है,
जबकि इसका वज़ूद नंगा है।


रात सारी टहल-टहल कर वो,
अपनी खामोशियों से मिलता है।

  • सूबे सिंह सुजान

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Comment by सूबे सिंह सुजान on March 24, 2013 at 9:22pm

सूर्य बाली, योगी सारस्वत,सौरभ जी धन्यवाद

Comment by सूबे सिंह सुजान on March 24, 2013 at 9:22pm

सौरभ जी आपकी बात पर ध्यान देना है


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 16, 2013 at 8:31pm

वाह क्या खूब मतला है ! वाह-वाह !

आखिरी शेर भी बहुत खूबसूरत बन पड़ा है. उसके लिए विशेष बधाई. 

दोनों मिसरे का है से अंत होने के कारण चाँदनी वाले शेर में तकाबुलेरदीफ़ का दोष है.

आदमी कपड़े तो पहनता है.. भी हुस्ने मतला ही है.  लेकिन उसका स्थान बदल जाने से दोष युक्त हो गया है.  इसमें भी तकाबुलेरदीफ़ का ही दोष है.

Comment by Yogi Saraswat on March 15, 2013 at 11:57am

आदमी कपडे तो पहनता है,
जबकि इसका वज़ूद नंगा है।
रात सारी टहल-टहल कर वो,
अपनी खामोशियों से मिलता है।

बहुत सुन्दर ! एक एक अश'आर अपने आपमें पूर्ण ! बहुत बेहतरीन

Comment by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on March 15, 2013 at 8:15am

वाह सुजान जी क्या खूब ग़ज़ल काही है॥हर एक शेर लाजवाब...दाद कुबूल करें !

Comment by सूबे सिंह सुजान on March 15, 2013 at 7:25am

aashish ji,,  thanks

चाँदनी आज और बढ गई है,
चाँद पर कोई जाके बैठा है।...........ye sher muje bhi pyara lagta hai

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on March 14, 2013 at 11:43pm

चाँदनी आज और बढ गई है,
चाँद पर कोई जाके बैठा है।

क्या कहने जनाब.. वाह वाह !!!

Comment by सूबे सिंह सुजान on March 14, 2013 at 11:02pm

हां वीनस जी,,काफ़िया में है

Comment by सूबे सिंह सुजान on March 14, 2013 at 10:58pm
thanks venus kesari bhi ji.....aapki bat par dyan de rha hun..........
Comment by वीनस केसरी on March 14, 2013 at 1:48pm

वाह बहुत खूब .......

रात सारी टहल-टहल कर वो,
अपनी खामोशियों से मिलता है।

इस हासिले ग़ज़ल शेअर के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें

मतला और हुस्ने मतला के बाद कुछ अशआर के उला में रदीफ, और कुछ में काफिया का प्रयोग किया गया है उन पर नज़रे सानी फरमा लें 

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